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अध्याय : सातवां }
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विवि प्रतिषेधो का इस नियम अनुसार शेपास्त्वपरगाः' इस सूत्र में कथित पश्चिम समुद्र को जाने वाली नदियों का ही यहां ग्रहण होता और चतुर्दश नदी सहस्त्र परिवृता गंमादयो नद्यः ऐसा सूत्र करने पर पूर्व समुद्र को जाने वाली नदियों का ही ग्रहण होता। अतः सब नदियों को ग्रहण करने के लिये 'गंगासिन्ध्वादयो' वाक्य सूत्र में आवश्यक है।
गंगा, सिन्धु नदियों को परिवारनदियां चौदह-चौदह हजार, रोहित और रोहितास्या नदियों की परिवारनदियां अट्ठाईस-अट्ठाईस हजार, हरित और हरिकान्ता नदियों की परिवारनदियां छप्पन छप्पन हजार, सीता और सीतोदा नदियों में प्रत्येक को परिवार नदियां एक लाख बारह हजार हैं । नारी और नरकान्ता, सुवर्णकूला और रूप्यकुला, रक्ता और रक्तोदा नदियों के परिवारनदियों की संख्या क्रम से हरित और हरिकान्ता, रोहित और रोहितास्या, गंगा और सिन्धु नदियों के परिवार नदियों की संख्या के समान है। .... . - भोग भुमि को नदियों में त्रस जीव नहीं होते हैं । जम्बूद्वीप सम्बन्धी मूल नदियां अठत्तर हैं। इनकी परिवारनदियों की संख्या पन्द्रह लाख बारह हजार है। जम्बूद्धीप में विभंग नदियां बारह हैं ।
इस प्रकार पश्चिममेरु सम्बन्धी मूल नदियां तीन सौ नब्बे हैं और इनकी परिवारनदियों को संख्या पिचहत्तर लाख साठ हजार है । विभंग नदियों की संख्या साठ है। भरत क्षेत्र का विस्तार-...
भरतः षड्विंशति पच योजन शत विस्तारः षट् चैकोन विशति भागा योजनस्य ॥११८३॥
भरत क्षेत्र का विस्तार पांच सी छब्बीस योजन और एक योजन के उन्नीस भागों में छह भाग ५२६, है । मागे के पर्वत और क्षेत्रों का विस्तार--
___ तदद्विगुरादिगुरण विस्तारा वर्यधर वर्षा बियेहान्ताः ॥११८४॥
___ आगे-आगे के पर्वत और क्षेत्रों का विस्तार भरत क्षेत्र के विस्तार से द्रनादुना है । लेकिन यह क्रम विदेह क्षेत्र पर्यन्त ही है । क्षेत्र से उत्तर के पर्वतों और क्षेत्रों का विस्तार क्षेत्र के विस्तार से आधा-आधा होता गया है । .