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[ गो. प्र. चिन्तामणि ऐरावत क्षेत्र में बहती हैं। ...
देव कुरु के मध्य में सीतोदा नदी सम्बन्धी पांच ह्रद हैं । प्रत्येक हद के पूर्व और पश्चिम तटों पर पांच-पांच सिद्ध कूट नामक क्षुद्र पर्वत है । इस प्रकार पांचों ह्रदों के तटों पर पचास क्षुद्र पर्वत हैं। ये पर्वत पचास योजन लम्बे पच्चीस योजन चौड़े और संतीस योजन ऊंचे हैं। प्रत्येक पर्वत के ऊपर अष्ट प्रातिहार्य संयुक्त, रत्न, सुवर्ण और चांदी से निर्मित, पल्यङ्कासनारूढ़ और पूर्वाभिभूख एक-एक जिन प्रतिमा है।
अपरं विदेह से भी सीतोदा नदी सम्बन्धी पांच ह्रद हैं। इन हदों के दक्षिण और उत्तर तटों पर पांच-पांच सिद्धकूट नाम के क्षुद्र पर्वत हैं । अन्य वर्णन पूर्ववत् है ।
.: इसी प्रकार कुरा में सीता सम्बन्धी पांच लद हैं । इन हदों के पूर्व और पश्चिम तटों पर पूर्ववत् पचास सिद्ध कूट पर्वत हैं । पूर्व टिदेद में भी सीता नदी सम्बन्धी पांच हद हैं। इन ह्रदों के दक्षिण और उत्तर तटों पर पचास सिद्ध कूट पर्वत हैं । इस प्रकार जम्बूद्वीप के मेरु सम्बन्धी सिद्धकूट दो सौ हैं, और पांचों मेरु सम्बन्धी सिद्ध कूटों की संख्या एक हजार है । शेष बची हुई नदियां कहां जाती हैं ?
शेषारस्वपरगाः ॥११८१॥
पूर्व सूत्र में कही गई नदियों से शेष बची हुई नदियाँ पश्चिम समुद्र को जाती हैं, अर्थात् गंगा और सिन्धु में से सिन्धु पश्चिम समुद्र को जाती है । यही क्रम आगे भी है। नदियों का परिवार--
चतुर्दश मदी सहस्त्र परिवता गंगासिन्ध्वादयो नः ।।११८२॥ गंगा, सिन्धु आदि नदियां चौदह हजार परिवार नदियों से सहित हैं।
यद्यपि बीसवें सूत्र गत 'सरितस्तन्मध्यगाः' इस वाक्य में आये हुये सरित शब्द से इस सूत्र में भी नदी का सम्बन्ध हो जाता, क्योंकि यह नदियों का प्रकरण है फिर भी इस सूत्र में 'नछः' शब्द का ग्रहण यह सूचित करता है कि आगे-आगे की युगल नदियों के परिवार नदियों की संख्या पूर्व-पूर्व की संख्या से दूनी दूनी हैं !
यदि 'चतुर्दश नदी सहस्त्र परिव्रता नद्यः' इतना ही सूत्र बनाते तो 'अनन्तस्य ।