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________________ अध्याय : सातवां । [ ४६५ है। ये दोनों नदियां भरत क्षेत्र में बहती हैं । हिमवान पर्वत के ऊपर स्थित पद्महद के उत्तर तोरण द्वार से रोहितास्या नदी निकली है, जो जघन्य भोग भूमि में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है। महापग्रहद के दक्षिरा तोरण द्वार से रोहित नदी निकली है, जो जघन्य भोग भूमि में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिल जाती है । रोहित और रोहितास्या नदी हैमवत क्षेत्र में बहती है । महा पग्रहद के उत्तर तोरण द्वार से हरिकान्ता नदी निकली है, जो मध्यम भोग भूमि में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है । निषध पर्वत के ऊपर स्थित तिगिच्छ के ह्रद के दक्षिण तोरण द्वार से हरित नदी निकली है, जो मध्यम भोग भूमि में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिलती है । हरित और हरिकान्ता नदियां हरिक्षेत्र में बहती हैं। तिगिच्छ हद के उत्तर तोरण द्वार से सीतोदा नदी निकली है, जो अपर विदेह और उत्तम भोग भूमि में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है । नील पर्वत पर स्थित केसरी ह्रद के दक्षिण तोरण द्वार से सीता नदी निकली है, जो उत्तम भोग भूमि और पूर्व विदेह में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिल जाती है । सीता और सीतोदा नदियां विदेह क्षेत्र में बहती हैं। केसरी हद के उत्तर में तोरण द्वारसे नरकान्ता नदी निकली है, जो मध्यम . भोग भूमि में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है । रुक्मि पर्वत पर स्थित महा पुण्डरीक ह्रद के दक्षिण तोरण द्वार से नारी नदी निकली है, जो मध्यम भोगभूमि में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिल जाती है। नारी और नरकान्ता नदी रम्यक क्षेत्र में वहती हैं। महापुण्डरीक हृद के उत्तर तोरण द्वार से रूप्यकूला नदी निकली है, जो जघन्य भोग भूमि में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है । शिखरी पर्वत पर. स्थित पुण्डरीक हद के दक्षिण तोरणद्वार से सवर्णकूला नदी निकली है, जो जघन्य भोग भूमि में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिलती है। सुवर्णकूला और रूप्यकूला नदी हैरण्यवत् क्षेत्र में बहती हैं। पुण्डरीक ह्रद के पश्चिम तोरण द्वार से रक्तोदा नदी निकली है, जो विजयाद्ध पर्वत को भेदकर म्लेच्छ खण्ड में बहती हुई पपिसम समुद्र में मिल जाती है । पुण्डरीक ह्रद के पूर्व तोरण द्वार से रक्ता नदी निकली है, जो विजया पर्वत को भेदकर भ्लेच्छ खण्ड में बहती हुई समुद्र मिल जाती है । रक्ता और रक्तोदा नदी य-TACinemamanasam-12 म स
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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