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________________ अध्याय : दसवां ] हरिवंश पुराण में कहा है कि पूर्व जन्म के स्नेह से द्रपद राजा की पुत्री द्रौपदी ने अर्जुन को हो पति स्वीकार किया था। द्रौपदी के पंच भर्तारी रूप से अावाद का कारण पूर्व जन्म का निदान बंध रहा है । द्रौपदी ने अपने पुर्वभव में बहुत प्रत पालन किये थे । उसकी दृष्टि वसंतसेना वेश्या पर पड़ी जो अनेक कामी व्यक्तियों से घिरी हुई थी । उसे देखकर द्रौपदी के जीव ने बसंतसेना के समान सौभाग्य की मनोकामना की थी उसके फलस्वरूप द्रौपदी को सती होते हुये भी पंचभर्तारी रूप का अपवाद प्राप्त हुआ । हरिवंश पुराण के ये वाक्य ध्यान देने योग्य हैं वसंतसेनां गणिकां कामुकैः परिवेष्टिता । दृष्ट्वा वन-विहारेऽसावेकदा तोडनोखतां ॥१६२६॥ निदानमकरोत् क्लिष्टा दुर्यशः प्राप्तिकारणम् । सौभाग्यमोदृशं मेऽन्ये जम्मन्यस्स्विति सादरा ॥१६३०॥ अतएव द्रौपदी को सीता की तरह सती मानना चाहिये । सीता जिस प्रकार रामचन्द्र की रानी थी, इसी प्रकार द्रौपदी अर्जुन की रानी थी। सती स्त्री का अपवाद महान पाप का कारण है, अतएव सती द्रौपदी को पंचभारी मानने की कल्पना भी पाप का कारण होगी। हिन्दू परम्परा में भी द्रौपदी की अहिल्या, सीता, लारा, मंदोदरी के साथ पंचमहापतिव्रताओं में गणना की जाती है अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मंदोदरी सथा। पंचसाध्वीं स्मरेन्नित्य महापातकनाशिनीम् ।।१६३१॥ २४. कामदेव महापुरुष नं० कामदेवों के नाम ... कौन से तीर्थकाल कौन सी गति निवारण क्षेत्र में हुए ? प्राप्त की? N aamsastemarenesammer सिद्ध भए पोदनपुर बाहुबलि प्रजापति श्रीधर दर्शनभद्र ऋषभनाथ अजित संभवनाथ अभिनन्दन Domepageeer
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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