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________________ ८०६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि विद्याधरों के लिये वानर शब्द का व्यवहार बल पड़ा। यही कथन पद्मपुराण पर्व १६ आया है --- शब्दोऽस्यत्र प्रयोगवान् । यष्टिः कुलकरस्तथा ।। १६२६॥ श्रयं तु व्यक्त एवास्ति यष्टि हस्तो यथा तथा वानर चिन्हेन छत्रादि विनिवेशिना : विद्याधरा गता ख्याति वानरा इति विष्टये ।।१६२७॥ यह बात स्पष्ट है कि एक शब्द का दूसरे स्थान पर भी प्रयोग होता है । रखने वाले पुरुष को यष्टि कहते हैं, इसी प्रकार कुत रखने वाले को कुन्त कहते हैं । इसी प्रकार छत्रादि में विद्याधर लोगों की जगत में वानर रूप से प्रसिद्धि यष्टि अर्थात् लाठी को हाथ में अर्थात् भाले को हाथ में विद्यमान वानर चिन्ह के कारण हुई ग्रन्थ का यह पद भी महत्त्वपूर्ण है एवं वानरकेतुनां वंशे संस्थात विवजिताः । errettः कर्मभिः प्राप्ताः स्वर्ग मोक्षं च मानवाः ।।१६२८ ॥ इन वानर ध्वजा वालों के वंश में उत्पन्न होने वाले असंख्य मानवों ने अपने उद्योग के द्वारा स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्त किया है । इससे हनुमान के faar में शंका को रंचमात्र भी स्थान नहीं रहता है । महान् पुण्यात्मा, बलशाली, ज्ञानवान हनुमान विद्याओं के स्वामी पुरुषरत्न थे । उसकी ध्वजा में वानर का चिन्ह था। आज भी भिन्न-भिन्न राष्ट्रों के ध्वजचिन्ह अनेक प्रकार के रहते हैं । उन चिन्हों के कारण उन राष्ट्रों को चिन्हात्मक स्वीकार करने पर बड़ा अनर्थ हो जायेगा। भारत का झंडा तिरंगा है। इससे भारतवासी को कोई तीन रंग वाला मानने लगे, तो जैसे उसे अज्ञानी कहेंगे। उसी प्रकार कपि का ध्वज होने के . कारण हनुमान को कपि मानकर वैसा श्रद्धान न करना होगा । हिन्दू पुराणों की दृष्टि और सर्वज्ञ ज्ञान से प्रकाशित जैन दृष्टि में बहुत अन्तर है । उदाहरणार्थ द्रौपदी का पंचभर्तारी मानना । जहां सती सीता को एक रामचन्द्र को ही पतिदेव स्वीकार करने के कारण स्तुति की गई है, वहां द्रौपदी को पांच व्यक्तियों की पत्नी कहना महान ग्रपवादपूर्ण वाणी हैं । शील तथा सदाचार के faपरीत है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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