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अध्याय : दसवा ]
। ८०५ संक्लिष्टों भरताधीशः सोऽस्मत्त इति यत्किल । हृद्यस्य हार्द सेनासीत्तत्पूजाऽपेक्षि फेवलं ॥१६२४॥
भरतेश्वर ने केवलज्ञान उत्पन्न होने के पहले जो बाहुबलि की पूजा की थी, वह अपने अपराध नाश करने के लिये की थी और केवलज्ञान उत्पन्न होने के बाद जी पूजा की थी, वह केवलज्ञान उत्पन्न होने का मानन्द मनाने के लिये की थी। ..
चक्रवर्ती ने जो बाहुबलि केवली की पूजा रत्नमयी की थी, उसका महाकवि ने इस प्रकार वर्णन किया है "भरतेश्वर ने रत्नों का अर्घ चढाया था । गंगा के जल की जलधारा दी थी। रत्नों को ज्योति के दीपक चढ़ाये थे। भोतियों से अक्षत की पूजा की थी, अमृत के पिंड का नैवेद्य चढ़ाया था । मलयागिरि चंदन की धूप चढ़ाई थी, पारिजात आदि देव वृक्षों के फूलों से पुष्पप्जा की थी।
सरत्ना निधयः सर्वे फलस्थाने नियोजिताः । पूजां रत्नमयोमित्थं रत्नेशो निरवर्तयत् ।।१६२५॥
फलों की जगह चवावर्ती भरत ने सब रत्न और निधियां चढ़ा दी थीं । इस प्रकार उन रत्नों के स्वामी भरतेश्वर ने रत्नमयी पूजा की थी।
जिनसेन स्यामी मे जो समाधान किया है, वह पागम का कथन होने से भान्य है ही, साथ में पूर्णतया मनोवैज्ञानिक भी है । इस पूजा द्वारा भरतेश्वर की उज्ज्वल, उदास तथा उत्कृष्ट गुरुभक्ति स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है ।।
चौबीस कामदेवों में हनुमानजी का भी नाम पाता है। कामदेव अपने शरीर सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध रहते हैं । इस पर यह शंका उत्पन्न होती है कि जगत में हनुमान का आकार बन्दर का माना गया है । उसके श्रेष्ठ सौन्दर्य की कल्पना विचित सी लगती है । यथार्थ रहस्य क्या है ?
हिन्दू पुराणों में राम भक्त हनुमान को वानर स्वीकार किया है । जैन ग्रन्थों में ऐसा कथन नहीं है । हिन्दू ग्रन्थ हनुमान को पवन अर्थात वायु का पुत्र कहते हैं । जैन शास्त्रों में ऐसी तर्क तथा युक्ति विरोधी मान्यता को तनिक भी स्थान नहीं है । महाराज पवनंजय विद्याधरों के राजा थे । उनको पुरुष पर्याय वाला माना है । उनके पुण्यवान, प्रतापी तथा चरम शरीरी पुत्र का नाम हनुमान था। उनकी ध्वजा में वानर का चिन्ह था। इससे उनको 'कपिध्वज' माना है। इन दानर चिन्ह के कारण