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________________ सम - M.. .HMMAR ८०४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि जैन ग्रामम ग्रन्थों के एक सौ उनहत्तर विशिष्ट महापुरुषों में २४ व्यक्तियों को कामदेव पदवी का धारक बताया है। जिनकी अलौकिक मूति उनके काम विजेतापने तथा वीतराग के उज्ज्वल भावों को प्रभावक रूप में व्यक्त करती हुई थमण बेलगोला के विध्यगिरि पर शोभायमान होती है, उन बाहुबलि भगवान का चौबीस काम. देवों में प्राद्य स्थान है, हनुमानजी की भी कामदेवों में गणना की जाती है, महाराज श्रीकृष्ण नारायण के पुत्र प्रद्युम्न की भी कामदेवों में गणना की जाती है। कामदेव यदवी के धारक, जिनदेव तथा जिन शासन के परम भक्त होते हैं । इनका अनुपम सौन्दर्य रमणी वर्ग के मन को मुग्ध करता है । सौन्दर्य के सिन्धु होते हुये भी इनकी मनोवृत्ति गृहस्थ जीवन में परनारी के प्रति मातृत्व की आदर्श भावना से अलंकृत रहती है। अनगार धर्मामृत में लिखा है कि अनेक रूपवती सुन्दरियां जिनके सौन्दर्य से आकर्षित होकर उनकी आकांक्षा करें, किन्तु जो जितेन्द्रिय सत्पुरुष अपने को निर्विकार रखें ऐसा जितेन्द्रिय महा-मना मानव कामदेव के नाम से जैन महापुरुषों की सूची में शोभायमान होता है। प्रथम कामदेव बाहुबलि स्वामी ने मुनि दीक्षा धारण करके एक वर्ष का उपवास किया था । कहा जाता है कि वे अंगूठे के बल पर खड़े रहे, क्योंकि उनके मन में इस बात का खेद था कि वे भरत की भूमि पर खड़े हुये हैं । बाहुबलि जैसे विचारवान व्यक्ति के मन में इस प्रकार की शल्य विचित्र सी दिखती है। इस विषय में महापुराणकार जिनसेन स्वामी ने इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला है । उन्होंने लिखा है "बाहुबलि ने एक वर्ष का उपवास धारण किया था । जिस दिन वह एक वर्ष का उपवास पुरा हुआ उसी दिन भरत ने पाकर उनकी पूजा की । उसी समय उन्हें अविनाशी केवलज्ञान रूपी परमज्योति प्राप्त हुई । युद्ध के समय मेरे द्वारा भरतेश्वर को क्लेश पहुंचा है । इस प्रकार का प्रेम बाहुबलि के हृदय में बैठा हुआ था, इसलिये उस केवल ज्ञान ने भरत द्वारा पूजा की अपेक्षा की थी। ___भावार्थ-भरत को मुझसे कष्ट पहुंचा है, यह प्रेम का भाव बाहुबलि स्वामी के हृदय में था । वह भरत के पूजा करते ही निकल गया और उस प्रेम रूप भाव के निकलते ही उन्हें केवलज्ञान प्रगट हो गया । महापुराणकार के शब्द ये हैं---
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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