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अध्याय : दसवां ]
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तथा अन्य धर्म के ग्रन्थों में इस बात की कथाएं हैं कि काम ने अपने हथियार कामिनी के द्वारा उनके धर्म में माने गये भगवान ब्रह्मा मादि की तपस्या का छेद कर किस प्रकार की दुर्गति की है । इस काम को मन्मथ भी कहते हैं। दधि मन्थन करने वाले काष्ठ यंत्र के संचालन द्वारा जैसे दधि का मन्थन होता है, उसी प्रकार काम पिशाच द्वारा भी पीड़ित पुरुष की मानसिक स्थिति होती है। अतएव इस काम वासना का क्षय करने के कारण जिनेन्द्र भगवान को जितकामारि कहा है। अनंत प्राणियों को अपने वश में करने वाले काम का नाश करने से जिनेन्द्र भगवान में अनंत शाक्ति का सद्भाव भी शास्त्रकारों ने सूचित किया है।
महादेव ने अपने तृतीय नेत्र द्वारा कामदेव को नष्ट कर दिया है, यह पौराणिक कथन वैज्ञानिक सत्य शून्य है । यदि शम्भु ने काम को जीत लिया या जला दिया तो फिर अपने आधे अंग में प्रिय पत्नी पार्वती को स्थान देने का और अर्व नारीश्वर नाम प्राप्त करने का क्या प्रयोजन है । शंभु के शरीर में काम के विनाश से उत्पन्न भस्म का लगाना विनोदस्पद है । जबकि विष्णु अपनी प्रिय वनिता से क्षण भर भी वियोग सहने की क्षमता शून्य है।
महाकवि धनंजय ने विवापहार स्तोत्र में ऋषभ जिनेन्द्र को काय का विनाशक स्वीकार किया है । कवि के शब्द हैं--
स्मरः सुदग्धो भवसैव तस्मिन्नुद्ध लितात्मा प्रावि शंभुः ।
अशेत दोपहतोऽपि विष्णुः किं गृह्यते येन भवानजागः ।।१६२२॥ इसका हिन्दी पद्य में इस प्रकार भाव समझाया गया है
कामदेव का किया भस्म जगत्राता थे ही, लीनी भस्म लपेटि नाम शंभु निजदेही। सोतो होय अचेत विष्णु वनिता करि हार्यो, तुमौं काम न ग्रह श्राप घट सदा उजारयों ।।१६२३॥
वैदिक संत भर्तृहरि ने अपने वैराग्य शतक में भोगियों में मुख्य रूप से अपनी प्रियतमा को शरीर में निरन्तर धारण करने वाले शंभु का उदाहरण दिया है और स्त्री संसर्ग का सदा के लिये याग करने वाले जिनेन्द्र वीतराग का विशेष रूप से उल्लेख किया है।