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________________ अध्याय दसवां : कामदेवमहापुरुष और विदेह क्षेत्र का वर्णन पुण्य कर्म के उदय से अत्यंत सुन्दर रूप धारण करने वाला जितेन्द्रिय सत्पुरुष कामदेव पदवी का धारक होता है। त्रिलोक पज्ञप्ति में लिखा है- काले जिवरा चवीसाणं हवन्ति चउवीसा | ते बाहुब्बलिमुहा कंदप्पा जिरू वमायरा ॥ * प्रर्थात्--- चौबीस तीर्थकरों के काल में चौबीस कामदेव होते हैं । इनका सौन्दर्य अनुपम होता है । परन्तु इस हुन्डावासपिणी काल के दोष से कामदेव पदवी प्राप्त महापुरुषों में भगवान शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ तथा अरहनाथ तीर्थंकरों का कथन आगम में आया है। कामदेवों का वर्णन पढ़ते समय किसी के मन में यह शंका उत्पन्न हो सकती हैं कि जितेन्द्र भगवान ने काम को जीता था, इसलिये सहस्त्र नाम पाठ में उन्हें जितकामारि: कहा है- "जितो जितकामारिरमितऽमितशासनः जित क्रोधो जितमित्रो जिसनलेशो जितान्तकः" ७-२ प्रश्न : -- वैदिक पुराणों में कथा आई है कि शिवजी ने अपने सोसरे नेत्र से काम को जलाया था, इसलिये इस विषय का समाधान श्रावश्यक हैं कि कामदेव का यथार्थ स्वरूप क्या है ? उत्तरः--काम शब्द द्वारा लोक जीव के विकारी भावों को ग्रहण किया जाता है । यह विकार मन में उत्पन्न होने से काम को मनसिज, मनोज, मनोभू आदि नामों से जन पुकारते हैं । इस कामभाव के कारण पुरुष स्त्री शरीर के प्रति उसी प्रकार आकर्षित होकर विनाश को प्राप्त करता है, जिस प्रकार प्रकाश प्रेमी पतंगा दीपक की जोति में होकर जल जाता है। जिनेन्द्र भगवान ने अपने आत्मबल और समाधि की प्रचंड अग्नि में उस काम विकार को सदा के लिये स्वाहा कर दिया । जिसके इशारे पर देव, दान, मानव, पक्षी, पशु आदि जीव नाचा करते हैं । वैदिक पुराणों
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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