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अध्याय : आठवां ]
[ ६०३ भी महत्व नहीं रखता । इसी प्रकार तीर्थंकर भगवान के कामदेव तथा चक्रवती पदवी के धारण करने तथा न करने के विषय में जानना उचित होगा । 'सर्वे पदाः हस्तिपदे निमग्नाः । हाथी के पांव के भीतर सभी के पांव समा जाते हैं, इसी प्रकार अचित्य, अद्भुत तथा त्रिलोक वंद्य तीर्थकर पदवी के समक्ष अन्य पदवियों का सद्भाव कोई विशेष महत्व नहीं रखता है।
तीर्थकर प्रकृति की श्रेष्ठता को सूचित करते हुये अकर्मक स्वामी लिखते हैं:'तीर्थकरत्वं हि प्रधानभूतं सर्वेषु सुभकर्मसु ततस्तस्य पृथग्रहणं क्रियते' (राजवार्तिक पृ. ३१०) समस्त शुभ कर्मों में तीर्थङ्करत्व प्रधान रूप है, इससे उसका नाम कर्म की प्रकृतियों में पृथक रूप से सूत्र में उल्लेख किया गया है ।
श्रेसठ शलाका पुरुष कहां-कहां से प्राकर जन्म लेते है ? मूलाबार में लिखा है...
रिसरयेहि गिग्गवारणं प्राणतर भवेहित्यि सियमादु । बलदेव-वासुदेवसणं च तह चक्क बदितं ॥१५०६॥
अर्थ :- नरक से आने वाला जीव अनन्तर भव में बलदेव, वासुदेव और चक्रवर्ती पद को प्राप्त नहीं करता है ।
स्वर्ग से आने वाला जीव उपरोक्त पदों को प्राप्त करता है । सिध्दान्तसार दोपिका में लिखा है. . निर्गस्य नरकान्जीवा चरश-बल-केशमाः । .
सम्छत्रवो न जायते चयंत्यसे यतो दिवः ।।१५०७।।
नरक से निकलकर बलदेव, बासुदेव तथा प्रतिवासुदेव और चक्रवर्ती पद को प्राप्त नहीं करते हैं।
स्वर्ग से आने वाले इन पद को धारण करते हैं।
त्रिलोकसार में भी लिखा है-“पिरयचरोगत्यि हरिबल-चक्की' मूलाचार में लिखा है-~
माणुस सिरियाय तहा सलागपुरिसारण होति खलुरिणयमा ।
सेसिं अणंतरभवे भयरिगन्जं मिथुदोगमणं ॥१५०॥ . मनुष्य और तिर्यञ्च गति से आकर तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव, नारायण प्रतिनारायण रूप शलाका पुरुष नहीं होते हैं।