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[ गो. प्र. चिन्तामणि कि वह विस्मय युक्त हो प्रभु के रूप' सुधा पान की लालसावश अपने दो नेत्रों के स्थान में हजार नेत्र बनाता है । यही बात समन्त भद्र स्वामी ने अरनाथ भगवान की स्तुति में कहा है
सवरूपस्य सौन्दर्य दृष्ट्वा तृप्तिमनापिवान् । . ट्यक्षः शक्रः सहस्त्राक्षो बभूव बहुविस्मयः ॥१५०४॥
ऐसा सौन्दर्य कामदेव में कहाँ पाया जाता है कि देवेन्द्र तक विस्मय के सिंधु में डूब जाय ? मामतुगाचार्य जिनेन्द्र के सौन्दर्य के विषय में लिखते हैं
यः शांतरागरूधिभिः ..परमाणुभिस्स्वम् । . निर्मापितस्त्रिभनेरलामा .॥ तावंत एवं खलु तेऽस्यमयः पृषिभ्याम् । यो समानमपरं न हि रूपमस्ति ।।१,५०५॥
हे त्रिलोक में शोभायमान जिनेन्द्र ! जिन शांततापरिपूर्ण परमाणुओं द्वारा आपके शरीर की रचना हुई है, वे परमाणु जगत् में उतने ही थे, इसी कारण आपके समान सुन्दर अन्य व्यक्ति नहीं पाया जाता ।
महावैभव तथा विभति का अधिपति भी तीर्थकर के चरणों को प्रमाण करता है, क्योंकि ज्ञान साम्राज्य के अधिपति तथा धर्मचक्र के स्वामी तीर्थङ्करत्व के समक्ष चक्रवर्ती पद तथा कामदेव पद विशेषता धारण नहीं करते। . शंका :-तीथंडर भगवान को विशेषता में कहा गया संपूर्ण कथन हमें .. मान्य हैं, फिर भी यह मानना है कि तीर्थसूरत्व के साथ उपरोक्त
चक्रवर्ती और कामदेव पदवी का संयोग उनमें अन्य तोयंकरो की
अपेक्षा कोई विशेषता उत्पन्न करता है या नहीं ? समाधान-लोक व्यवहार में शांतिनाथादि तीन तीर्थङ्करों को तीन पदवी का धारक कहते हैं और शेष इक्कीस भगवान् की इस प्रकार स्तुति नहीं की जाती, इतना अंतर तो उनमें है, किंतु परमार्थ दृष्टि से सब में समानता है ! एक उदाहरण से विषय स्पष्ट हो जायेगा । दिन के प्रकाश में यदि कोई एक जगह दो दीपक जला दे, तो क्या उस उजले से सूर्य के प्रकाश में वृद्धि हो जायेगी और उनके बुझाने से प्रकाश में न्यूनता पा जायगी ? सूर्य के प्रकाश के आगे दीपकों का जलना ने जलना तनिक
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