________________
अध्याय : पाठवा [
[ ६०१
अर्थ -- मुनीन्द्रों ने तीर्थंकर को त्रिभुवन का अद्वितीय स्वामी कहा है । उनके ऊपर चन्द्रोज्वल चौसठ चामर दुराये जाते हैं ।
त्रिलोक सार में लिखा है
भुवाहो तिथयरी धवलेहि सायहि सद्विहि
कोमुद्दीन कुमा विज्जभाषणो सो ।११५०२।।
: अर्थ-जो तीन लोक के द्वितीय स्वामी हैं। चान्दनी के समान श्रथवा कुन्द पुष्प के समान धवल चौसठ चामर जिन पर दुराये जाते हैं, वे तीर्थंकर भगवान हैं । अकलक स्वामी ने राजवार्तिक में लिखा है, 'यस्योदचात् आर्हत्यमचित्यविभूति विशेष युक्त मुमजायते तत्तीर्थंकरत्व नाम कर्म प्रतिपत्तव्यं ( पृ० : ३०९ ) जिस कर्म के उदय से श्रचित्य अर्थात् जिसकी कल्पना तक न की जा सके, ऐसी विभूति विशेष युक्त प्रत पद प्राप्त हो, उसे तीर्थंकरत्व नाम कर्म जानना चाहिये ।
स्वामी समंतभद्र ने तीर्थंकर नाम कर्म के उदय से प्राप्त होने वाली महंत पदवी को ग्रचित्य कहा है, अद्भुत होने के साथ त्रिलोक द्वारा पूजा अर्थात् स्तुति का कहा है। स्वयंभू स्तोत्र में पार्श्वनाथ भगवान की स्तुति में उनने ग्रहंत भगवान के प्रति पूर्वोक्त विशेषणों का प्रयोग किया है ।
स्वयोगनिस्त्रिशनिशात धारया निशास्य यो दुर्दयमोहविद्विषम् ।
arrer त्रिलोक पूजातिशयास्पदं पदम् ।।१५०३।२
श्रतएव तीर्थंकर पदवी के समक्ष कामदेव पदवी अथवा
चक्रवर्ती की वैभव
विभूति अपनी विशेषता नहीं रखती । जिस प्रकार सूर्य का नभोमंडल में प्रकाश व्याप्त होने पर रात्रि के समय अपनी ज्योत्स्ना द्वारा जगत् को आनंदित करने वाला चंद्र पलाशपत्र के समान पांडुर वर्णयुक्त हो जाता है, 'यद्वासरे भवति पाण्डु पलाशकल्पम्' उसका रंच मात्र भी महत्व नहीं रहता है और न उसके प्रकाश का स्वतंत्र पता चलता है, उसी प्रकार तीर्थङ्कर प्रकृति रूप सूर्य के प्रकाश फैलने पर चक्रaara arat कामदेव ने की विशेषता उस पुण्य सिंधु में विलीन हो जाती है ।
कामदेव, सौन्दर्य का अप्रतिम पुंज माना गया है, किन्तु उसकी तुलना तीर्थकर से नहीं हो सकती । तीर्थङ्कर भगवान के जन्म होते ही जन्माभिषेक के लिये उनको मेरु पर ले जाते समय इंद्र प्रभु के सौन्दर्य को देखकर इतना चकित होता है