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[ मो. प्र. चिन्तामरि . देवगति में प्रथम काल है । नरक में छठवां काल है । तियंञ्चगति तथा मनुष्य गति में छह काल होते हैं। कुमनुष्य भोग भूमि में तीसरा काल रहता है ! स्वयंभूरमरण द्वीपार्ध में तथा स्वयंभूरमण समुद्र में पंचमकाल समान काल पाया जाता है। सिद्धान्त सार दीपक मे कहा है
विजयार्थ नगेष्वन म्लेच्छखंडेषु पंचसु ।
चतुर्थ काल एवास्ति शाश्वतो निरूपद्रवः ॥१४६६॥ विजया पर्वतों मे पंच म्लेच्छ खंडों में सदा उपद्रवरहित चतुर्थकाल रहता है। नागेन्द्र पर्वताद्वाहा स्वयंभूरमसावे । स्वयंभूरमरण द्वीपार्धे कालः पंचमोऽव्ययः ।।१५००।
नागेन्द्र पर्वत के बाहर स्वयंभूरमरा द्वीप के अर्ध भाग में तथा स्वयंभूरमरण समुद्र में अविनाशी पंचमं काल रहता है।
विदेह क्षेत्र में सदा चतुर्ण काल रहने से शलाका पुरुष सदा पाये जाते हैं । भरत क्षेत्र में छह प्रकार का काल चक्र चलता रहता है । अतः यहाँ अवसपिरणी के चतुर्थ काल में तथा उत्सपिणी के तृतीय काल में तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव, नारायण, आदि महापुरुषों का सद्भाव पाया जाता है। शंका :--छह तीर्थंकर-चक्रवर्ती और कामदेव पद-भगवान शांतिनाथ,
कुन्थुनाथ तथा परनाथ तीर्थकर, चक्रवर्ती तथा कामदेव हुये हैं,
अतएव कोई यह सोचते हैं कि शेष इक्कीस तीर्थकर का पुण्य, * प्रभाव तथा सौन्दर्य पूर्वोक्त तीर्थकर अय की अपेक्षा न्यून होगा ?
समाधान---जगर में प्रत्येक दृष्टि से तीर्थंकर का पद श्रेष्ठ कहा गया है। जिस प्रकार प्रकाश में सूर्य के तेज की श्रेष्ठता को सभी स्वीकार करते हैं, इसी प्रकार . रूप प्रभाव, पुण्य, प्रताप आदि समस्त गुरगों की अपेक्षा तीर्थकर भगवान के समान अन्य नहीं है।
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... .. धबला टीका में लिखा है--
सकल भुवनेक नाथस्तीर्थकरो वय॑ते मुनिवरिष्ठः । " - विषुधवलचामराणां तस्य स्माद चतुःषष्ठि ॥१५०११॥
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