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अध्याय : पाठवा ]
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को कामदेव तथा चक्रवर्ती इन दो पदवियों के भी स्वामी कहे गये हैं । इस प्रकार से तोन पदवी तीर्थंकर, कामदेव तथा चक्रवर्ती पदवी के धारक कहे गये हैं अतएव व्यक्तियों की गणना की अपेक्षा. १६३ महापुरुष हुये हैं।
प्रश्न : - प्रेसठ शलाका महापुरुष कौन से हैं ?
उसर : -- १६६ पुण्य पुरुषों में चौबीस तीर्थकर, द्वादश चक्रवर्ती, नव वासुदेव नव प्रतिवासुदेव इस प्रकार ६३ सहपुरुषों को त्रेसठ शलाका महापुरुष कहते हैं । यह कथन जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्र की अपेक्षा है । धातकी खंड द्वीप में दो भरत क्षेत्र हैं । इसी प्रकार पुष्करार्ध द्वीप में भी दो भरत क्षेत्र हैं । इन चारों क्षेत्रों में जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र संमान १६६ पुण्य पुरुष माने गये हैं । पंच ऐरावत क्षेत्रों के विषय में भी ऐसा ही कथन पाया जाता है। पंचभरत पंच ऐसवत के समान पंच विदेह भी कहे गये हैं । प्रत्येक पूर्वापर विदेह में जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के समान बत्तीस-बत्तीस देश हैं । विदेह में सदा चौथे काल सदृश रचना पाई जाती है । यही बात त्रिलोकार संस्कृत का पाया में इस प्रकार कही गई है :'चतुर्थ कालो विदेहे वावस्थित एव' विदेह में चतुर्थकाल अवस्थित ही रहता है।
भरह इरावद पण पण मलेच्छखंडेसु खयर सेढीसु दुस्समदीदो, अंतोतिय हारिणबड्ढी य । १४६७॥
अर्थ - भरत तथा ऐरावत क्षेत्र सम्बन्धी पांच-पांच म्लेच्छ खंडो के तथा faerer for में तुर्थ काल के यादि से अंत पर्यंत आयु यादि सम्बन्धी हानि होती है । वहाँ पंचम काल तथा छठवा काल नहीं होते हैं। उत्सर्पिणी काल में तृतीय काल के आरम्भ से लेकर उसके अंत पर्यन्त वृद्धि होती है। वहां चतुर्थ, पंचम तथा षष्ठम काल नहीं होते । कहा भी है. ( अवसर्पिण्या ) पंचम पृष्ठ कालो ने प्रवर्तते । उत्सर्पिष्यां तु तृतीयः कालः स्यादित प्रारस्य तस्यैवांत पर्यन्तं वृद्धि से स्यात् । तत्र चतुर्थ पंचम पष्ठ काला न प्रवर्तन्ते । पृष्ठ ३५२.
पदमोदेवे चरिमो खिरए तिरिये परेबि छक्काला ।
दियो कुरणारे दुस्सम दुस्समसरिसो चरिमुवहिदीवृद्ध ।। १४६८ ।।
(सं. छाया ) -- प्रथमो देवे चरमो नरके तिरश्चि नरेपि षट् कालाः । तृतीयः कुनरे दु:षमसदृश चरमोदधिद्वीपायें ॥