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[ गो. प्र. चिन्तामणि है कि एक दिन दीक्षित मुनिराज महाव्रती हैं और अजिका महाव्रती नहीं है, उसके उपचार से महानत हैं, साक्षात् नहीं हैं । इसलिये तुरत पाक्षित मुनि को अधिक दिनों की दीक्षित अजिका भी प्राकर नमस्कार करती है । सो ही नीतिसार में लिखा है--
महत्तराययिकाभिवंदते भक्ति भाविता। अधदीक्षितमप्याशुवतिनं शान्त मानसम् ॥२०१५॥
इसीलिये कहा है कि मोक्षाधिकारी स्त्री नहीं हैं और पुरुष है, स्त्री प्रायिका कितनी भी तपश्चर्या करे तो भी मोक्ष नहीं होता है ।
चर्चासागर से पं. वपा. प्रश्न :--वर्तमान समय में निश्चय एकान्त मत का प्रचार किसने किया?
उत्तर :--एक स्थानकवासी साधु अपने साधुपद में था। स्थानकवासी समाज ने मिलकर अपने समाज से उस साधु को अपमानित सा निकाल दिया ! वहां से वह सोनगढ़ आये और कितने ही दिन वहां रहे। उसके बाद दिगम्बर आम्नाय में कुछ पंथों के झगड़ों को देखकर दिगम्बर आम्नाय में आये और मात्र प्राचार्य कुन्दकुन्द के साहित्य को लेकर, ऊपर से दिगम्बर अाम्नाय का चोला पहनकर एकान्त निश्चय मिथ्यात्व का प्रचार किया। प्रचार के लिये लोगों से द्रव्य एकत्रित करना शरू किया। अपने मत की प्रथम स्थापना. सोनगढ कहान पंथ के नाम से प्रसिद्ध किया। निश्चय एकान्त का लोगों को प्रवचन देना शुरू किया, प्राचार्य कुन्दकुन्द के समयसार को माध्यम बनाकर । अपने को आध्यात्मिक योगी प्रसिद्ध किया।
दिगम्बर अाम्नाय के कुछ श्रीमन्त सेठ लोग जाकर मिल गये और लोगों को रुपया दे देकर अपने पंथ में मिलाने लगे। कुछ दिगम्बर पण्डित लोग भी द्रव्य के लोभ से सोनमढ़ जाकर कहानजी स्वामी के पंथ का प्रचार करने लगे। इस काल में चारों तरफ इसी का बोलबाला हुअा। जब तक लोगों को मालुम नहीं पड़ा, तब तक खुब प्रचार हुआ । जब लोगों को कमी का पता चला तो दिगम्बर प्रास्नाय के लोगों ने विरोध शुरू किया। अब जो उस पंथ के समर्थक लोग थे, वे ही विरोध करने लगे।
प्रश्न :-विरोध किस कारण से हुआ ?
उत्तर :--अपने को तीर्थङ्कर बताना, सद्गुरु बताना, अपने को विदेह क्षेत्र से पाया बताना, ४ जीव विदेह क्षेत्र से पाये बताना । जिस समय कुन्दकुन्द स्वामी
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