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________________ अध्याय : दसवां ] सीमन्धर भगवान के समवशरण में गये, तब अपने को (कहानजी), चम्पा बहन को, शान्ता बहन को, खेमजी भाई को साक्षात् सीमन्धर भगवान के समवशरण में मौजूद बताना, कुन्दकुन्द स्वामी से अपना साक्षात्कार बताना। मैं पागे जाकर तीर्थङ्कर होऊँगा, ऐसा बताना । चम्पा बहन को जाति स्मरण है, ऐसा बताना । आदि अनेक विपरीत बातों से विरोध हुप्रा । प्रश्न :--निश्चय एकान्त मिथ्यात्व सोनगढ़ पंथ में सिद्धान्त विरुद्ध क्या क्या है ? उत्तर :-पुण्यात्रव की कोई क्रिया नहीं करना चाहिये, पाप की तरह पुण्य भी हेय है । उपादान रहे तो निमित्त स्वतः पा जाता है, इत्यादि कहना। जो कुछ है सो निमय ही है, व्यवहार का भोक्षमार्ग में कोई कार्य नहीं होता, इसलिये व्यवहार हेय है कहना । बत, संयम, त्याग, तप, दान, पूजादि नहीं करना चाहिये, मात्र प्रात्मा का ध्यान करने से कल्याण होगा, ऐसा एकान्त से कहना । एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, ऐसा एकांत से कहना। मोक्षमार्ग में निमित्तों का कोई कार्य नहीं, मात्र उपादान से ही कार्य की सिद्धि कहना । पञ्चम काल में कोई भावलिगी मुनि नहीं होते, होते तो द्रव्यलिगी ही होते हैं, ऐसा कहना ! जो कुछ होना है सो होकर ही रहेगा, पुरुषार्थ से कोई कार्य नहीं होता, ऐसा नियतिवाद को एकान्त से मानना । क्रमबद्ध पर्याय को मानना । मात्र आचार्य कुन्दकुन्द के शास्त्रों को ही महत्त्व देना, अन्य प्राचार्यों के शास्त्रों को नहीं मानना । शुभोपयोग की कोई क्रिया नहीं करनी चाहिये, उससे संसार बढ़ता है। जिनवाणी को परस्त्री कहना। एकान्त से प्रात्मा को त्रिकाल शुद्ध मानना । मोक्ष जाने में पर्याय का कोई महत्व नहीं है, ऐसा कहना । आत्मा का कभी नाश नहीं होता, जो लोग दया धर्म को मुख्य कहते हैं, वे
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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