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[ गो. प्र. चिन्तामणि अज्ञानी हैं, ऐसा कहना इत्यादि अनेक विपरीत मान्यताओं का प्रचार किया। .: कुछ मूर्ख अज्ञानी पण्डितों ने उसको खूब बढ़ावा दिया । कानजी ने अपने जीवन में किसी गुरु को नमस्कार नहीं किया, बल्कि गुरुषों की खूब निन्दा की और अपने लोगों से निन्दा कराई।
प्रश्न :-इसका फल क्या हुया ?
उत्तर :----अनन्त संसार और वर्तमान पर्याय में खूनी कैंसर रोग से ग्रसित हुए । अन्त में बम्बई जसलोक अस्पताल में प्रार्तध्यान से प्राण छोड़े और दुर्गति को प्राप्त हुए। अन्त समय में रंगमोकार मन्त्र भी किसी ने नहीं सुनाया और किसी भी तरह स्वामीजी बच जायं, उसके लिये नाना प्रकार की अशुद्ध दवाइयों का प्रयोग, अशुद्ध इजेशनों का प्रयोग, नाक आदि में नलियों का प्रयोग किया गया, तो भी नहीं बचे।
क्या यही समाधि है ? इसी प्रकार समाधि होती है ? साधारण श्रावक भी अन्त समय में समाधिपूर्वक मरण करता है, लेकिन कानजी स्वामी ४० साल तक अात्मा-आत्मा कहते रहे और मरण हुआ दुर्गति से। इन्होंने तो अन्तिम समय में समाधि भी नहीं की और मरण के बाद भी इनके भक्तों ने ३ दिन तक स्वामीजी की लाश को पड़ी रखी। उनके शव में असंख्यात जीवराशि की उत्पत्ति हो गई और फिर तीसरे दिन असंख्यात जीवराशि के साथ उनके शव को आग में डालकर जला दिया । यह दशा है एकान्त निश्चय मिथ्यादृष्टियों की और आत्मार्थियों की अहिंसा । अपने को मुमुक्षु कहलाने वाले सन्त ने अपने जीवन के अन्त में क्या पाया ? इसका थोड़ा सा भी कभी विचार नहीं किया । न अन्त समय में भावलिंगी मुनि ही बने, न समस्त परिग्रहों का ही त्याग किया, न अंत समय में आहार-पानी का ही त्याग किया।
प्रश्न :---क्या ये स्वामीजी दिगम्बर मुनि थे ?
उत्तर :-नहीं, ये तो न दिगम्बर मुनि थे और न श्वेताम्बर साधु ही रहे । ये तो अतोभ्रष्ट-ततोभ्रष्ट रहे ।
प्रश्न :--सोनगढ़ से निकलने वाला साहित्य कैसा है ?
उत्तर :- सोनगढ़ से निकलने वाला साहित्य ही निश्चय एकान्त मिथ्यात्व, का पोषण करने वाला है। सब साहित्य में विकार भरा हुआ है। जो भी उस साहित्य को पढ़ते हैं, वे सब एकान्ती बनकर आत्मा-प्रात्मा कहते हैं और दान