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[ गो. प्र. चिन्तामणि
कई अन्य मति जन्म जरा मरण से व्याप्त रागद्वेषादि विष से मूर्च्छित सर्व साधारण मनुष्य के समान क्षुधा तृषा आदि १८ दोषों से ग्राच्छादित | Fee व्यसनों (कट पदार्थी ) कर सहित संगम और जान से रहित, ऐसे श्रात्मा को नाम मात्र से सर्वज मानते हैं
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इतरोऽपि नरः षड्भिः प्रमाणे वस्तु संत्रयम् । परिच्छिन्दन्मतः कैश्चित्सर्वज्ञः लोऽपि नेक्ष (ष्य ) ते । ५८५ ॥ तथा कई ने १. प्रत्यक्ष, २. अनुमान, ३ उपमा ५ प्रर्थापत्ति और ६. प्रभाव, इन छः प्रमारणों से वस्तु के समूह को जानते हुए अन्य पुरुष को भी सर्वज्ञ माना है, सो वह भी सर्वज्ञ नहीं है ।
अतः सम्यक्स विज्ञेयः परित्यज्याभ्य शासनम् ।
युक्त्यागम विभागेन ध्यातु कामै मनीषिभिः ॥ ५८६ ॥
इस कारण जो सर्वज्ञ भगवान का ध्यान करने के इच्छुक बुद्धिमान् पुरुष है, उनको चाहिये कि अन्य मतों को छोड़कर, युक्ति और आगम से निर्णय करके सर्वज्ञ को सम्यक् प्रकार से निश्चय करें ।
युक्त्या वृषभ सेनाद्यं निद्व यासाधु वल्गितम् ।
यस्य सिद्धिः सतां मध्ये लिखिता चन्द्र मण्डले ।।५८७
जिस सर्वज्ञ की सिद्धि वृषभसेन आदि गणधर और आचार्यों ने युक्ति से साधु दुर्जनों के कथन का खंडन करके, सत्पुरुषों के बीच में निर्मल चन्द्र मण्डल में लिखी है ।
अनेक वस्तु संपूर्ण जगद्यस्य चराचरम् । स्फुरत्य विकलं बोध विशुद्धा वर्शमण्डले ।। ५८८ ॥ स्वभावजमसंदिग्धं निर्दोषं सर्व यस्य विज्ञानमत्यक्षं लोकालोकं
दोदितम् । विसर्पति ॥५८॥
यस्य विज्ञान धर्माशु-प्रभा प्रसर पीडिताः 1 क्षणादेव क्षयं यान्ति खद्योता इव दुर्नया: ॥५०॥
पाद पोठोकृता शेष त्रिदशेन्द्र सभाजिरम् । योगिग जगन्नाथं गुण रत्न महार्णवम् ॥५६.१.