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अध्याय : पांचवां ]
[ २८१ दिव्यरूप धरं धोरं विशुद्ध ज्ञान लोचनम् । अपित्रिदश योगीन्दैः . कल्पनातीत वैभवम् ॥५८०।।: . स्याद्वाद .पविनिर्घातभिन्नान्यमतभूधरम् । ज्ञानामृत पयः पूरेः . पचित्रितप्तगत्त्रयम् ११५८१॥ इत्यादि गणनातीत गुण रत्नमहार्णवम् ।
देव देवं स्वयम्वुद्ध स्मराध जिनभास्करम् ।।५८२॥
इस रूपस्थ ध्यान में अरहन्त भगवान का ध्यान करना चाहिये; जिममें घरहंत का किस प्रकार का स्वरूप चिन्तवन करना चाहिये सो कहते हैं—अरहन्तता की महिमा जो समवशरणादि की रचना है उस सहित, सर्वज्ञ, परमेश्वर, देवेन्द्र चन्द्रमा . मर्यादि को सभा के मध्य में स्थित, स्वयंभु । तथा समस्त अतिशयों से संपूर्ण, सव . लक्षणों से लक्षित, तथा जिनसे समस्त जीवों का हित होता है, ऐसे, और शील कहिये इत्तम गुण रूपी पर्वत के शिखर । तथा सप्त धातु से रहित और मोक्ष लक्ष्मी जिनको कटाक्ष पूर्वक देखती है ऐसे, अनन्त महिमा के अाधार सयोग केवली, परमेश्वर । तथा .. अचिन्त्य है चरित जिनका, और सुन्दर परित्र वाले गणधरादिक मुनिगुणों से सेवनीय .. तथा अनेक नयों से निर्णय किया है विश्व अर्थात् समस्त वस्तुओं का आकार स्वरूप अगत् जिन्होंने ऐसे, और समस्त जगत् के हितू । तथा इन्द्रियों के ग्रामों को रोकने वाले, विषय रूप शत्रुओं को निषेध कर देने वाले तथा रागादिक सन्तान का कर दिया है नाश जिन्होंने ऐगे, और संसार रूपी अग्नि के बुझाने को मेघ के समान। . तथा दिव्य रुप के धारक, धीर अर्थात् क्षोभ रहितं, निर्मल ज्ञान ही जिनके नेत्र हैं : से, देव और योगीश्वरों की कल्पना से प्रतीत है विभव जिनका ऐसे । तथा स्याद्वाद माप वन से खड़े हैं अन्य मत रूपी पर्वत जिन्होंने ऐसे, तथा ज्ञान रूप अमृत मय जन के प्रवाहों से पवित्र स्वरूप किया है तीन जगत जिन्होंने ऐसे, इनको आदि लेकर गणना से अतीत गुग्ण रूप रत्नों के महासमुद्र, देवों के देवं, स्वयं बुद्ध, जिनों के सूर्य, ऐसे श्री. ऋषभ देव सर्दन का हे मुने, तू चिन्तवन (ध्यान) कर ।
जन्म मृत्यु जरा कान्तं रागादिविष भूछितम् । . सर्व साधारण दोष रष्टादशभिरावृतम् ॥५८३॥ अनेक व्यसनोच्छिष्ट संयम ज्ञान विच्यतम् । . . . संज्ञा. मात्रेण केचिच्च सर्वज प्रतिपेदिरे ।।५८४॥
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