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परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती श्री १०८ प्राचार्य आदिसागरजी महाराज
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जीवन परिचय
[ले० परम पूज्य १०८ गणधराचार्य कुन्थुसागर जी महाराज के परम fron युवक सट श्री १०८ सुनि कुमुदनन्दिजी महाराज ] आदि सागराचार्य वर्य, गुरू पद महावीर कीर्ति बंदू त्रिकाल । सन्मति सिंधू को नमन कर वरण जीवन की जयमाल ||
परम पुज्य प्रातः स्मरणीय अध्यात्म योगी, चारित्र चक्रवर्ती, धर्म दिवाकर, जगदवंद्य, महर्षि योगीन्द्र चूडामणि द्वितीय सन्त श्रादिसागरजी का परिचय जितना हमने पढ़ा और सुना है उसे संक्षिप्त में लिख रहा हूँ ।
महाराष्ट्र प्रान्त में एक "अंकली" नाम का छोटा किन्तु मनोहर गांव है | वहां पर १००८ श्री श्रादिनाथ जिनालय है, जिसमें सतत् वर्षण होता रहता है। इसी गांव में जिन भक्त स्वधर्मनिष्ठ, सदाचारी, धर्मात्मा, श्री सिद्धगीडा पाटील अपनी ध. प. अक्काबाई के साथ निवास करते थे । शिवगौडा जिनका जन्म १८६६ में शुभ स्वप्न पूर्वक हुंग्रा जो हमारे धर्म नेता हुए। एक दिन बच्चों ने मिलकर खेल में इन्हें कमरे में बन्द कर दिया । कुछ क्षणों में मुक्कों से किवाड तोडकर हँसते हुए बाहर निकल गये । बड़े-बड़े कद्दू (काशीफल ) को हाथ की चपेट से फोड़कर कच्चा ही खा लेना, पचा लेना . साधारण बात श्री नाश्ते में एक सेर गुड व एक सेर मूंगफली पानसुपारी के समान थी। अपनी गृहस्थी में उपवासादिपूर्वक ही रहते थे ।