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अचानक एक दिन अधिक प्यास लगी। इन्होंने चने के पानी को छाछ . समझकर पी लिया। कुछ ही क्षगण बाद पेट से सर्प निकल भागा। यह
देखकर घर वाले. दंग रह गये । सं. १८०६ में नांदजी गांव में जिनप्पा. स्वामी के पास क्षुल्लक दीक्षा धारण की और प्रादि सागर नाम से ..... विख्यात हुए। उस समय मुनिमार्ग व्यवस्थित नहीं था, अतः तीन महिने बाद में जिनेन्द्र प्रभु की साक्षी में ऐलक हो गये। और तीन-तीन उपवास के बाद प्राहार करने लगे और ५ प्रकार के स्वाध्याय में .. तल्लीन हो गये । सं. १८१४ मंगसर शुक्ल र मुक नक्षत्र मंगलवार को दस बजे सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरि जी में श्री देशंभूषण, कुलभूषण भगवान
के सानिध्य में स्वयं (आत्मप्रबोध) बल से . निर्ग्रन्थ मुनि दीक्षा . वारा की । .. . . ...
. .... ... - मुनि दीक्षा धारण करने के बाद आप प्राचार्य पद से सुशोभित हुए। आपकी तपस्या बहुत अद्भुत एवं कठोर थी । आप सात-सात उपवास पर अाहार 'लते थे। और बाहार में भी एक ही वस्तु का आहार लेते थे। आपने समाधि से पूर्व अपना प्राचार्य पद मुनिः .. श्री १०८ महावीर कीति जी महाराज को प्रदान किया । आपकी समाधि संवत् १६६E में फाल्गुन कृष्णा तेरस को अवगांव (कुजवन) में हुई । आप अंकली गांव के रहने वाले थे, अतः आप परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती श्री १०८ प्राचार्य प्रादिसागरजी महाराज (अंकली कर) के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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‘परम पूज्य श्री १०८ प्राचार्य महावीर कीतिजी महाराज
परमपूज्य श्री १०८ प्राचार्य महावीर कीति जी महाराज अपने गुरू के समान ही उच्च कोटि के महान् विद्वान् एवं तपस्वी सिंद्ध हुए। प्रापका जन्म फिरोजाबाद नगर में हुआ और आपके पिता का नाम रतनलाल व माता का नाम बूंदादेवी जी था । आपका नाम श्री महेन्द्रकुमार था । दिगम्बरीय दीक्षा धारण कर प्राचार्य पद से