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________________ : 2 बिपित होकर आपते भारतवर्ष के नगर-नगर और ग्राम-ग्राम में वहार कर जिनधर्म का प्रचार किया और अनेक भव्यात्मानों को वैराग्य की अोर बढ़ने का सदोपदेश देकर दिगम्बरीय दीक्षायें प्रदान को । आज आप ही के परम शिष्यों में परम पूज्य श्री १०८ सन्मार्ग . दिवाकार निमित्तज्ञान शिरोमणि खण्डविद्या धुरन्धर आचार्य विमलसागरजी महाराज, महान् तपस्वी प. पू. श्री १०८ प्राचार्य सन्मति सागरजी महाराज, ...भी. रणधराचार्य कुन्थुसागरजी महाराज, प. पू. श्री १०८ प्राचार्य संभवसागरजी महाराज हमारे बीच विद्यमान है । इन सभी प्राचार्यों के द्वारा कितनी धर्म प्रभावना.. हो रही है और कितना लाभ भव्यात्माओं को पहुँच रहा है, यह शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। .. ... परम पूज्य १०८ प्राचार्य सन्मति सागरजी महाराज : . परंमपूज्य आचार्य महावीर की तिजी महाराज ने समाधि के पूर्व अपना प्राचार्य पद · . संघस्थ परम तपस्वी श्री १०८ मुनि ... - सन्मतिसागरजी महाराज को प्रदान किया। आप भी परम तपस्वी, जानी, श्यानी प्राचार्य हैं । भारतवर्ष देशके नगर-नगर और गांव-: । । गांव में विहार कर भव्यजनों को धर्मामृत. पान करा रहे हैं । ...
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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