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________________ . 2.3 st. [ गो. प्र. चिन्तामणिः - हण्डक का बंध पहले. गुगास्थान. में है और कुब्जक, वामन, स्वाति, न्यग्रोध परिमंडल इन चार का बंध दूसरे गुगास्थानों तक है और समचतुरस्त्र का बंध पाठवे के छठे भाग तक है और संस्थानों (छहों) का उदय तेरहवें तक है। वज्रवृषभनाराच संहनन का बंध चौथे गुणस्थान तक है । वज्रनाराच, नाराच, अर्द्धनाराच, कीलित इनका बंध दूसरे गुरगस्थान तक है, असंप्राप्तसृपाटिका का बंध प्रथम गुणस्थान में है । और अंत के तीन संहननों का उदय सातवें गुणास्थान तक है। नाराच और वज्रनाराच संहनन का उदय . ग्यारहवें गुणस्थान तक है । बञवृषभनाराच का तेरहवें गुगास्थान तक है। - निमणि का बंध नाठवें के छटे भाग तक है, उदय तेरहवें गुगास्थान तक है। अप्रशस्तगति का बंध दूसरे गुणस्थान तक है। प्रशस्त का आठवें के .. छठे भाग तक है । और दोनों का उदय तेरहवें सयोग गुणस्थान तक है। ... उद्योत का बंध दूसरे गुगणस्थान तक है और उदय पंचम गुणस्थान तक है । अगुरुलघु, उपधात, उछ्वास इन चार का बंध पाठवें के छठे भाग तक है, उदय तेरहवें तक है। स्थावर का बन्ध पहले गुणस्थान में ही है । उदय दूसरे गुणस्थान : तक है । बस, बादर, पर्याप्त इनका बन्ध अपूर्वकरण के छठे भाग तक है . और उदय चौदहवें गुणास्थान तक है। प्रत्येक शरीर का बन्ध पाठवें के छठे भाग तक है, उदय तेरहवें तक है । अस्थिर, अशुभ इन दो का बन्ध छठे गुग्णस्थान तक है, उदय तेरहवें । तक है । स्थिर, शुभ इनका बन्ध, अाठवें के छठे भाग तक है, उदय तेरहवें । गुणस्थान तक है। दुर्भग, दुस्वर, अनादेय, इस तीन का बन्ध दूसरे गुरगस्थान तक है, .. उदय तेरहवें गुरास्थान तक है । मुभग, प्रदिय इनका बन्ध पाठवें के छठे . .... भाग पर्यंत है, उदय चौदहवें गुणस्थान तक है । सुस्वर का बन्धं आठवें के. . .. छठे भाग तक है, उदय तेरहवें गुगास्थान तक है ! तीर्थक र प्रकृति का बन्ध : ANNSEEEEEE P al int iswrite Dowan r nmARATHI saram
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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