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नीगोत्र का बंध पहले में है और उदय पांचवें गुणास्थान तक, agenda का बंध पहले गुणस्थान में होता है, उदय नौवें गुणस्थान के वेद (चौथे) भाग तक है ।
स्त्रीवेद का बंध दूसरे गुणस्थान तक है और उदय नौवें गुणस्थान के वेद भाग तक है ।
श्रध्याय: पहला ]
संज्वलन लोभ का बंध नांवें तक है, उदय दसवें तक है । ग्ररक्षि शौक इनका बं छठे तक है, उदय आठवें तक है ।
निद्रा, प्रचला इनका बंध तक आठवें तक है, अपूर्वकरण के प्रथम भाग तक है, उदय क्षीणकषाय के उपांत समय तक है । निद्रा-निद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि इनका बंध दूसरे तक है और उदय छठे गुणस्थान पर्यन्त है ।
तरका का प्रथम गुणस्थान में ही है. उदयं चौथे गुणस्थान तक है । तिर्यग्गा का मंत्र दूसरे तक है, उदय पांचवें तक हैं। मनुष्यायु का 'बंध चौथे गुणस्थान तक है, उदय चीदवें गुणस्थान है ।
- नरकगति तथा श्रानुपूर्वी इनका बंध प्रथम गुणस्थान में ही है और उदय चौथे में हैं । तिर्यग्गति तथा यानुपूर्वी इनका बंध दूसरे तक है, उदय ate गुणस्थान तक हैं और गति का उदय पांचवें तक होता है ।
मनुष्यगति का बंध चौथे गुणस्थान तक होता है, उदय चौदह गुणस्थान तक होता हूँ । एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय और चौथे इन्द्रिय का बंध पहले में है, उदय दूसरे तक है।
श्रदारिक शरीर, औदारिक अंगोपांग इनका बंध चौथे तक होता है, उदय चौदहवें के उपरांत समय तक होता है ।
पूर्वकरण के छठवें भाग पर्यंत है और उदय चौदहवें
पंचेद्रिय का बंध
गुणस्थान तक है ।
तेजस, काम का बंध चाटवें गुणस्थान के छठे भाग तक है और उदय चीदह गुरसस्थान के उपान्त समय तक है ।