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[ गो. प्र. चिन्तामणि चक्री ऊंच नीच धरै भप दीयो मनै करै ।
.. एई पाठ कर्म हरै सोई हुमैं तारै हैं ।।" का प्रश्न :--किस कर्म प्रकृति का कहाँ बंध और कहाँ उदय होता है ? उत्तर :-देवगति, देवायु, देवगत्यानुपूर्वी तीन प्रकृतियाँ, बैक्रियक शरीर, वैक्रियक :
मांगोपांग ये दो, पाहारक शरीर, पाहारक प्रांगोपांग ये दो, अयशस्फीति प्रकृति इन पाठों प्रकृतियां ऊपर के मुरणस्थान में बंधती हैं और नीचे के गुणस्थान में उदय में आती हैं ।
संज्वलन लोभ के बिना पंद्रह कषाय (अनंतानुबंधी ४, अप्रत्याख्यानी .. ४, प्रत्याख्यानी ४, संज्वलन ३ (क्रोध, मान, माया) हास्यादिक में चार - हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, पुरुषवेद, मनुयायु, सूक्ष्म, अपर्याप्त प्रकृति, : साधारण प्रकृति, पाताप प्रकृति, मिथ्यात्व - ये छब्बीस प्रकृतियां जिस-जिस .
गुणास्थान में बंधती हैं, उसी उसी गुणस्थान में उदय में आती हैं । शेष . छियासी प्रकृतियां, उसमें ज्ञानावरणीय ५, दर्शनावरणीय , वेदनीय २, गोत्र
२. अन्तराय ५, चारित्रं मोहनीय की ५, अायु २, नामकर्म की ५६ (गति . ३, आनुपूर्वी. ३, जाति ५, शरीर ३, औदारिक प्रांगोपांग, वर्णादिक ४, संस्थान ६, संहनन ६, निर्माण १, अगुल्लघु, उपघांत, परघात, श्वास, उद्योत, विहायोगति २, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, यश कीर्ति, स्थिर २, शुभ २ सुभग २, त्रस २, तीर्थकर, प्रादेय १, सुस्वर २) इन छियासी प्रकृतियों का .. बंधन नीचे के गुगास्थानों में होता है और उदय ऊंचे गुणस्थानों में होता है। .
___ ज्ञानावरण की ५, अंतराय ५. दर्शनावरणीय ४ इन चौदह प्रकृतियों का बंध दश गुणस्थान तक होता है, और उदय बारहवें गुणस्थान तक होता है । यशकीर्ति और ऊंचगोत्र इनका बंध दशा में गुणास्थान तक है और . उदय चौदहवें गुगास्थान के. अन्त तक होता है । ...
साता वेदनीय कर्म का बंध तेरहवें गुरशस्थान तक होता है और उदय चौदहवें गुणस्थान तक होता है । साता बेदनीय का बंध छठे गुणस्थान तक होता हैं और उदय चौदहवें तक होता है । .
१. चर्चाशतकः पृष्ठ नं० १३६ । ..
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