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अध्याय : पहला ]
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उदय में आये तब सुख-दुःख रूप हो जाय, लौकिक सुख में अपने को सुखी : जाने, दुःख में अपने को दुःवी माने, मुख तो थोडा लेकिन दुःख तो बहुत
हैं, यह वेदनीयकर्म है । : जैसे शराब पीने से पागल होता है, कुछ भान नहीं रहता हैं, वैसे ही
ही मोहनीय कर्म के उदय से जीव मोह में मतवाला हो जाता है और विपरीत कार्य करने लग जाता, समझाने पर भी नहीं समझता है । : ...... जैसे चोर का काठ (लकडी) में पांच घुसाकर सांकल से बांध दिया जाय, तो वह कहीं पर भी नहीं जा सकता है, वैसे प्रायु कर्म जब अगली गति बंधती है, तब वर्तमान गति को छोड़े नहीं छुटे, नायु पहले बंधे बिना शरीर को प्रात्मा नहीं छोडता है। - जैसे चित्रकार नाना भांति के चित्र बनाता है, वैसे ही नामकर्म के उदय से जीव एकेन्द्रियादि नाना प्रकार की गति में भ्रमणा करता है, नाना प्रकार के रूप धारण करता है - यह नाम कर्म का ही कार्य है।
___ जैसे कुम्हार नाना प्रकार से छोटे बड़े बर्तन बनाता है, वैसे ही गोत्रकर्म जीव को ऊँच नीच कुल में उत्पन्न कराता है।
जैसे गजा तो दान देना चाहे और भंडारी मना करे; वैसे ही जीव .. तो कोई कार्य करना चाहता है, परन्तु उस कार्य में अन्तराय पड जाता है।
उस कार्य को नहीं होने देता है। . इन्हीं माठ कर्मों के उदाहरणो को चर्चाशतक में छन्दबद्ध किया है - "देव परयो है पट रूपकौं न ज्ञान होय ।।
जैसे दरवान भूप देखनी निवार हैं। सहत लपेटी असिधारा मुखदुःखकार |
मदिरा ज्यौं जीवनिकौं मोहनी विधार है। " काठमैं दिया पाव करै थिति को सुभाव। .
- चित्रकार नाना नाम चित्र कौं सभार हैं।
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