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________________ ४२ ] । गो. प्र. चिन्तामसि तो चौथ में अथवा तीसरे में अथवा दूसरे में वा पहले में ये चार मार्ग गीरने के हैं - इस प्रकार पांचवें गुणस्थान के पांच मार्ग हैं । छठे गुग्गस्थान के छह मार्ग हैं । छठे से ऊपर चढ़े, तो सातवें में जाता . : है और नीचे गोरे, तो पांचवें अथवा चौथे में अथवा तीसरे में अथवा दुसरे में अथवा पहले में जाता है । गीरने के पांच मार्ग और चढ़ने की अपेक्षा एक, ये छह मार्ग छठे गुणस्थान के हैं। सातवें अप्रमत्त गुणस्थान, पाठवें अपूर्वकरण गुणस्थान, अनिवृत्तिकरण गुग्णस्थान, दशयां सूक्ष्म सोगराय गुणास्थान ये चार गुणस्थान उपशम .. श्रेणी के हैं। सातवें, पाठवें, नववें, दशवे इन चारों गुणस्थान की अपेक्षा सीन-तीन मार्ग हैं । नोचे गीरे तो एक-एक गुणस्थान चारों अनुक्रम से गीरे और ऊपर, चढे तो एक-एक गुणस्थान अनुक्रम से ऊपर चढे और जो भरे तो चतुर्थ गुणस्थान में श्रावे, तव अवतरूपकार्मागा निकले और देवगति को प्राप्त करे। . . . ग्यारहवें उपशात कपाय गुणस्थान इसके दो मार्ग हैं। नीचे गोरे तो दशवे सूक्ष्मसापराय गुणस्थान में ग्रावे और मरण हो तो चौथे में प्राकर मरण होता है और नियम से देव होता है । ऐसा ही नियम जिनागम का है। प्रश्न :--पाठों कर्मों के नाठों दृष्टान्त कौन-कौनसे हैं ? उत्तर :---अव यहां पर पाठों कमों के अलग-अलग दृष्टान्त कहते हैं। (१) जैसे प्रतिमा पर पहा डालने से प्रतिमा दिखाई नहीं देती हैं, वैसे ही ज्ञानावरणीय कर्म आत्मा के ज्ञान गुण को पाच्छादित करता है । सो ज्ञानगुण के प्रगट हुवे बिना वस्तु को नहीं जाने, ज्ञानगुरण का प्रावरण जब हट जाय तब ही यथावत् पदार्थ का स्वरूप जाने। . . . (२) जैसे दरवाजे का दरबान (पहरेदार) राजा के पास नहीं जाने देता है, उसी प्रकार दर्शनावरणीय कर्म दर्शनगुराग को प्रकट नहीं होने देता है । दर्शन के बिना पदार्थ का स्वरूपा यथावत् देखने का अभाव होता है। . (३) जैसे शहद लपेटी तलवार की धार चाटने से शहद से मह मीठा होता है, और जीभ कट जाने से दुःख भी होता है, वैसे वेदनीयकर्म जो -":. . - - - -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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