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________________ [ ४७ चौथे से लेकर प्राठों के छठें भाग तक होता है, उदय चौदहवें गुणस्थान पर्यन्त होता है । अध्याय: पहला ] प्रश्न :- चौदह गुरुस्थानों में जीव मर कर कौन-कौन सी गति में जाता है ? - मिश्र गुणस्थान, क्षीणकपाय गुणस्थान, सयोगकेवली गुरणस्थान इन तीन " गुणस्थानों में जीव का मरण नहीं होता है - यह नियम है । उत्तर : सातवें गुणस्थान, प्राट गुणस्थान, नौवें गुणस्थान, दसवें गुग्गास्थान और ग्यारहवें गुणस्थान ये पांचों ही गुणस्थान उपशम के हैं, यहां से मरण करके चौथे स्थान में यावे, अन्तसमय में अवतरूप हो कार्माण निकलता है । प्रथम गुणस्थान में मरने वाला जीव चारों ही गति में उत्पन्न हो सकता है, लेकिन देवगति में जाये तो नौवें यक तक जाता है । आगे के स्वर्गों में नहीं जा सकता । दूसरे सासादन गुणस्थान में मरा कर जीव नरक गति के बिना बाकी तीनों ही गति में जा सकता है । सांसादन गुणस्थानं वाला कभी नरक में नहीं जा सकता है - यह नियम है । जिस जीवने पहले मिथ्यात्व परिणामों में कोई भी गति का बंध बांध रखा हो और पीछे सम्यक्त्व प्राप्त किया हो, तो ऐसा जीव मर कर चारों ही गति में जा सकता है । यहां इतना विशेष जानना की नरक में जावे तो तीसरे नरक से आगे नहीं जावें और क्षायिक सम्यक्त्व वाला जीव प्रथम नरक तक ही जाता है, अगर मनुष्य अथवा तिर्यंच होवे तो भोगभूमि का ही होता है, कर्मभूमि का नहीं, देवगति में जावे तो स्वर्ग ही जाय । अगर श्रायु बन्ध पहले नहीं किया है, तो चौथे गुणस्थान में मरा कर देवगति में जाता है । पांचवे गुणस्थान से लेकर ग्यारवें गुणस्थान तक इन सातों ही गुरंग - स्थानों में मरम करने वाला जीव देवगति में ही जाता है । और गति में कदापि नहीं जाता है । और देवगति में भी कल्पवासी देव ही होता है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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