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[ गो. प्र. चिन्तामणि __. प्रयोग केवली गुणस्थान में पंडीत-पडीत मरण कर एक सिद्धशीला
ही जाता है, फिर यहां से कभी कोई गति ग्रहण नहीं करता । प्रश्न :-नौवें गुणस्थान में ३६ प्रकृतियों का क्षय किस प्रकार है ? उत्तर :--प्रत्याख्यानावरणीय कपाय.४ और अप्रत्याख्यानावरणीय कषाय ४, संज्वलन
चौकड़ी में से लोभ को छोड़कर तीन, नौ नो कषाय, चार जाति, विकलत्रयः ।। तीन, स्थावर, पातप, उद्योत, सूक्ष्म, साधारण और नरक गति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यञ्च गति, तिर्यञ्च गत्यानुपूर्वी ये सब मिलाकर ३६ प्रकृतियों । नवें गुणस्थान में क्षपक श्रेणी वाला क्षय करता है।
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प्रश्न :- चौदह गुरास्थानों में कर्मों का प्राश्रव किस प्रकार है ? उत्तर:-पहले गुणास्थान में पांच मिथ्यात्व अन्त में घटे। दूसरे सासादनः गुरणस्थान ।
में अनन्तानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ ये चारों ही घटे । पांचवे गुणस्थान में में ग्यारह प्रकृतियां कम होती हैं---पांच इन्द्रियां, छटा मन, पांच स्थावर । की विराधना ये ग्यारह घटते हैं और प्रत्याख्यान ४ ये भी कम हो जाती । हैं- कुल मिलाकर १५ कम होती हैं । बैंकिंवक, बैक्रियक मिथ, अप्रत्याख्यान । की ४ और बस का बात ये सात चौथे गुणस्थान में होती है। छठे प्रमत्त । गुणस्थान में प्राहारक, आहारक मिश्र ये दो कम होती हैं । आठवें अपूर्व करण गुणस्थान में हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा ये छह नोकपाय । कम हो जाती हैं। नौवें गुणस्थान में नपुंसक, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और संज्वलन की. ३ क्रोध, मान, माया ये छह कम होती है। . . .
दसवें गुग्गस्थान में एक सूक्ष्म, लोभ कम हो जाता है । यारहवें क्षीणः । कपाय गुगास्थान में असत्य मन, उभय मन, असत्य वचन, उभय बचन ये चार कम होती हैं । तेरहवें संयोग केवली गुरास्थान में सात योग कम होते हैं। मिश्व योग और कार्मागा योग ये चारों ही गुणस्थान में होते हैं अर्थात । प्रथम, द्वितीय, चौथे, तेरहवें गुणस्थान में, अाहारक की अपेक्षा मिश्च के छठे । प्रमत्त गुणस्थान भी हैं । कामणि की अपेक्षा चारों ही गुणस्थान हैं। :
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