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K-4955
अध्याय : पहला ]
[ ४६ --चौदह गुणस्थानों में चारों आयु का बंध और उदय कैसे है ? उत्तर :---नरक प्रायु का बंध तो प्रथम गुणस्थान में होता है, अन्य गणस्थानों में नहीं .
होता है । नरकायु का उदय मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, अविरत इन गुण
स्थानों तक है, आगे नहीं है । तिर्यञ्च प्रायु का बंध मिथ्यात्व, सासादन इन ... दो गुणस्थानों में होता है, अागे बंध नहीं है और लिर्यच प्रायु का उदय
मिथ्यात्व, सासादन, मित्र, असंयम, देशसंयम इन पांचों गुणस्थानों में है, नागे नहीं है । मनुष्य यायु का बंध मिथ्यात्य से लेकर चौथे गुरणस्थान तक
बंध है और देवायु का टांध मिथ्यात्व से लेकर सातवें गुणस्थान तक होता * है, और उदय प्रथम गुगगस्थान से लेकर चतुर्थ गुणस्थान तक होता है,
ग्रागे देवायु का उदय नहीं होता है। मनुष्य अथवा तिर्यञ्च ने सरल परिगणामों से अथवा कुटिल परिणामों से नरकायु बांधी तथा तिर्यच्चायु बांधी तथा मनुष्यायु का बंध बांधा हो, तो ऐसे आयु बंध वाला गुणस्थान परिपाटी चढ़े चौथे गुरास्थान से आगे न बड़े-यह नियम है ।
तीसरे गणस्थान में नरक यायु तिर्यञ्च प्रायु मनुष्य सायु, देवायु इन . . चारों आयु का बंध नहीं होता है, मरण भी नहीं होता है, यह सिद्धान्त का
नियम जानना। प्रश्न :- छहों लेश्यावाले के मिथ्यात्व गुणस्थान में कौनसे कर्मों का बंध होता है ? उत्तर :-- दो इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय ये तीन विकल मय से स्के. नहीं, सो सक्षम,
अनंतनि का समुदाय सो साधारन, अन्तरालवर्ती सो अपर्याप्त, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, वरकाथु (इन ११७ का) मिथ्यात्व गुणास्थान में कृष्णा, नील, कापोत लेश्यावाला जीव एक सौ सत्रह प्रकृति का बंध करता है । ऊपर कहे नौ, विकलत्रय ३, नारकं ३, सूक्ष्म, साधारण्य, अपर्याप्त इन नौ भाब प्रकृति के बिना एक सौ प्रकृति का पीत लेश्यावाला जीव (मिथ्यात्व में बंध करता है। एकेन्द्रिय, स्थावर और सातप इन तीन बिना पालेश्यावाला जीव मिथ्यात्व .. में एक सौ पांच प्रकृति का बेध करता है । तिर्यकच गति, तिर्यच प्रायू, . . तिर्यच गत्यानुपूर्वी, उद्योत इन चार प्रकृति के बिना मिथ्यात्व गुणास्थान में शुक्ल लेया बाला जीव एक सौ एक प्रकृतियों का बंध करता है।
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