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________________ ५० गु श्यायें मि. सा. मि. कृप्सा नील कापीत पीत १०८ १०१ ७८ पच १०५ १०५ ७४ शुक्ल १०१ ६७ ७४ कोष्टक अ. दे. प्र. 3 3 3 ११७ १०१ ७४ ११७ १०.१ ७४ ७७.० ११७ २०१ ७४ • 02 5 0.0 ७ म. ु ० ७ ७७ ६७ ६३ ५६ म. ปี O G O अ. सु. उ. श्री. स. अ. ० 27 ० ¢ [ गो. प्र. चिन्तामणि: · Q ० 5 ७७ ६७ ६३ ५६ ७७ ६७ ६३ ५६ ५८ २२ १७ १ や Q B ० १ 9 2 ० a प्रश्न :- केवलज्ञान के समय ६३ प्रकृतियों का नाश जीव करता है, वे कौनसी हैं ? उत्तर :-- नरकगति, तिर्यच गति, नरक गत्यानुपूर्वी, तिर्यचगत्यानुपूर्वी ये चार प्रकृतियां और एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, आतप उद्योत साधान रन, सूक्ष्म, स्थावर -- ये तेरह प्रकृतियां नामकर्म की हैं । देवायु, तिर्यञ्चायु, नरका ये १६ प्रकृतियां ग्रघातिया की हैं । ज्ञानावर ५, दर्शनावरण & मोहनीय की २० अन्तराय ५ ये ४७ प्रकृति घातियायां कर्म की है - सब मिला कर ६३ प्रकृतियों का नाश कर जीव केवलज्ञानी बन जाता है । प्रश्न :- चारों गतियों में बन्ध योग्य प्रकृतियां कितनी हैं ? उत्तर :- प्रौदारिक, औदारिक अंगोपांग, ग्राहारक आहारक बांगोपांग, नरक गति देवगति, नरका, देवायु, नरकगत्यानुपूर्वी, देवगत्यानुपूर्वी ये सब दस प्रकृतियां हुई। दो इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय, सूक्ष्म, साधारन, अपर्याप्त इन सोलह प्रकृतियों के बिना एक सी चार प्रकृतियां देवगति में सामान्य बंधने योग्य हैं । एकेन्द्रिय, स्थावर आतप इन तीन प्रकृतियों के बिना, नरकगति में नारकी के सामान्य एक सौ एक प्रकृतियों का बंध होता है । देवगति में १०४ है, उसमें तीन बटायें तो १०१ होती हैं । एक सौ बीस प्रकृतियों
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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