________________
अध्याय : आठवां ]
[ ६२३ जिनेन्द्र भगवान के द्वारा धर्म तीर्थ प्रवृत्ति होती है, इससे उनको धर्म तीर्थंकर कहते है । मूलाचार के इस अत्यन्त भाव पूर्ण स्तुति पद्य में भगवान को धर्म तीर्थंकर कहते हैं
लोगज्जोरा धम्मतित्थयरे जिरणवरे व अरहते । कित्सरण केवलिमेव य उत्तमवोहिं मम विसंतु ॥१५३७॥
जगत् को सम्यग् ज्ञान रूप प्रकाश देने वाले धर्म तीर्थ के कर्ता उत्तम, जिनेन्द्र, अर्हन्त केवली मुझे विशुद्ध बोधि प्रदान करें, अर्थात् उनके प्रसाद से रत्नत्रय धर्म की प्राप्ति हो।
तीर्थकर शब्द का प्रयोग भगवान महावीर के समय में अन्य संप्रदायों में भी होता था, यद्यपि प्रचार तथा रुढ़िवश तीकर शब्द का प्रयोग जिनेन्द्र भगवान के लिये किया जाता है। जैन शास्त्रों में भी तीर्थंकर शब्द का प्रयोग श्रेयांस राजा के साथ. करते हुए उनको दान तीर्थकर कहा है । अतएव तीर्थंकर शब्द के पूर्व में धर्म शब्द को लगाकर धर्म तीर्थकर रूप में जिनेन्द्र का स्मरण करने की प्राचीन प्रणाली रही है।
__ समीचीन धर्म की व्याख्या करते हुए प्राचार्य समंतभद्र ने लिखा है कि सम्य. ग्दर्शन, सम्यक्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूप धर्म है, जिससे जीव संसार के दुःखों से छूटकर श्रेष्ठ मोक्ष सुख को प्राप्त करता है, इस धर्म तीर्थ के कर्ता इस असपिरगीकाल की अपेक्षा वृषभदेव आदि महावीर पर्यन्त चौबीस श्रेष्ठ महापुरुष हुए हैं । तीर्थंकर का पद किसी की कृपा से प्राप्त नहीं होता है । पवित्र सोलह प्रकार की भावनाओं तथा उजवल जीवन के द्वारा कोई पुण्यात्मा मानव तीर्थकर पद प्रदान करने में समर्थ तीर्थंकर प्रकृति नाम के पुण्य कर्म का बंध करता है। यह पद इतना अपूर्व है कि दस कोड़ा कोड़ी सागर प्रमाण इस अवसर्पिणी काल में केवल चौबीस ही तीर्थंकरों ने अपने जन्म द्वारा इस भरत क्षेत्र को पवित्र किया है । असंख्य प्राणी रत्नत्रय की समाराधना द्वारा . अहन्त होते हुए सिद्ध पदवी को प्राप्त करते हैं, किन्तु भरत क्षेत्र में तीर्थंकर रूप में जन्म धारण करके मोक्ष जाने वाले महापुरुष चौबीस ही होते हैं। प्रश्न :- सोलह कारण भावना के नाम क्या हैं ?. जिन्हें तीर्थकर
भाते हैं ? .. उत्तर :-तीर्थङ्कर प्रकृति के बंध में कारण, ये सोलह भावनाएँ प्रागम में
IDOEmiranam-
AMAINA
MRAPAD