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________________ - amirma -manandinanciatio mamarmalamumariomomymaravmurwasnasumnamaasummeme-PusparinaametotaaRIESewa ६२२ ]. [ गो. प्र. चिन्तामणि __ वैदिक धर्म की मान्यता है कि धर्म की ग्लानि होने पर धर्म की प्रतिष्ठा स्थापना हेतु शुद्ध अवस्था प्राप्त परमात्मा मानवादि पर्यायों में अवतार धारण करता है । जिस प्रकार बीज के दग्ध होने पर वृक्ष उत्पन्न नहीं होता, उसी प्रकार रागद्वेष, मोह आदि विकारों के बीज प्रात्मसमाधि से नष्ट होने पर परम पद को प्राप्त प्रात्मा का रागद्वेष पूर्ण दुनियां में आकर विविध प्रकार की माला किसान सुविस, सविचार तथा गंभीर चिंतन के विरुद्ध है। प्रश्न :-तीर्थ और तीर्थकर किसे कहते हैं ? उत्तर :- तीर्थ और तीर्थकर-इस तीर्थकर शब्द में आगत तीर्थ शब्द के स्वरूप पर विचार करना उचित है । प्राचार्य प्रभाचन्द्र ने लिखा है, 'तीर्थमागमः तदाधारसंघश्च' अर्थात् जिनेन्द्र कथित प्रागम तथा पागम का आधार साधुवर्ग तीर्थ है । तीर्थ शब्द का अर्थ 'घाट' भी होता है । अतएव तीर्थंकरोतीति तीर्थकरः' का भाव यह होगा, कि जिनकी वाणी के द्वारा संसार सिंधु से जीव तिर जाते हैं, वे तीर्थ के कर्ता तीर्थकर कहे जाते हैं ! सरोवर में घाट बने रहते हैं, घाट से मनुष्य सरोवर के बाहर सरलता पूर्वक या जाता है, उसी प्रकार तीर्थकर भगवान के पथ प्रदर्शन का अवलंबन लेने वाला जीव संसार सिंधु में न डूब कर बाहर आकर चिन्तामुक्त हो जाता है। मूलाचार में तीर्थ के दो भेद कहे हैं एक द्रव्य तीर्थ, दूसरा भावतीर्थ । द्रव्य तीर्थ के विषय में इस प्रकार स्पष्टीकरण किया गया है-- दसणारण चरित्ते गिजुत्ता जिरणवरा दु सन्वेपि । तिहि कारोहिं जुत्ता सम्हा ते भावदोलित्थं ॥१५३६।। सभी जिनेन्द्र भगवान सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्रचारित्र संयुक्त हैं। इन तीन कारणों से युक्त हैं इससे भगवान भावतीर्थ हैं । जिनेन्द्र वाणी के द्वारा जीव अपनी आत्मा को परम उज्ज्वल बनाता है, उस रत्नत्रय भूषित प्रात्मा को भावतीर्थ कहा है । जिनेन्द्र रूप भाव तीर्थ समीप में षोडशकारण भावना को भाने वाला जीव तीर्थंकर बनता है। रत्नत्रय भूषित जिनेन्द्र रूप भावतीर्थ के द्वारा अपवित्र आत्मा पवित्रता को प्राप्त कर जगत् के संताप को दूर करने में समर्थ होता है । इस जिनदेव रूप भावतीर्थ के द्वारा प्रात्मा तीर्थकर बनता है और श्रुतरूप तीर्थ की रचना में निमित्त होता है। m awakoare. -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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