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करवाया है । इसके अलावा भी प्रापने कई ग्रंथ लिखे हैं। जो ग्रंथ . । अन्य भाषाओं में थे; उनकी टीकायें भी की, और उन ग्रंथों का प्रकाशन भी हुना, जिनसे अनेक लोग स्वाध्याय करके लाभ प्राप्त . कर रहे हैं।
इस प्रकार गरगधराचार्य महाराज के गुणों के बारे में जितना लिखा जावे उतना ही कम है । मात्र मैं तो इतना कह सकता हूँ कि .. |
आज के युग में परम पूज्य श्री १०८ गणधराचार्य महाराज पार्ष परम्परा के दृढ़ स्तम्भ होने के साथ साथ त्याग व तपस्या की साक्षात् . मुर्ति हैं। ..
. : - गंगाधराचार्य महाराज ने जितने कठिन परिश्रम से इस ग्रंथ का संग्रह किया था, उतना ही इसको प्रकाशन करने का कार्य भी . बहुत कठिन था। क्योंकि ग्रंथ प्रकाशन का कार्य बहुत मुश्किल होता है, कितनी ही बाँधायें इसमें पाती हैं. यह तो करने वाले व कराने वाले ही जानते हैं, लेकिन गुरु आशीर्वाद से सब कार्य आसान हो जाते हैं, जिनको दृढ़ श्रद्धान होता है। पूज्य आचार्यों ब गराधराचार्य महाराज के शुभाशीर्वाद पर दृढ़ श्रदान करके हमने ग्रंथ का प्रकाशान का कार्य प्रारम्भ करवाया और अनेकों बाँधायें आने के बावजूद भी हमने इस ग्रंथ को समय पर प्रकाशन करवाने में पूर्ण सफलता प्राप्त की है। - इस ग्रंथ के प्रकाशन में कलकत्ता दि. जैन समाज एवं अन्य महानुभावों का गुप्त सहयोग हुया है। वास्तव में उन सभी दानवीरों ने शानदान के महत्त्व को समझकर पूर्ण लाभ प्राप्त किया है । ग्रंथमाला के लिए यह बहुत ही गौरव ब प्रसन्नता की बात है कि इतने विशाल ग्रंथ का प्रकाशन इस प्रकार गुप्तदान के सहयोग से करा सकी है। ग्रंथमाला की ओर से मैं उन सभी दातारों का बहुत-बहुत प्राभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद देता हूँ और पाशा करता हूँ कि भविष्य में भी उनका सहयोग इसी प्रकार से मिलता रहेगा।'
परम पूज्य श्री १०८ प्राचार्य रत्न विमलसागर जी महाराज के शिष्य पूज्य श्री १०५ क्षुल्लक चैत्यसागरजी महाराज का इस ग्रंथ !
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