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ग्रंथ में प्रत्येक विषय को समझाने के लिये कितना कठिन । परिश्रम महाराज ने किया है. यह तो आप स्वयं ही ग्रंथ को पढ़कर . के जानकारी प्राप्त कर लेगे। मैं तो मात्र इतना ही बता सकता हूं : कि इस एक ही ग्रंथ के स्वाध्याय करने से धर्म प्रेमी बंधुओं को अनेकों ग्रंथों का स्वाध्याय हो जावेगा । जिससे सभी ग्रंथों के विषयों की हानकारी प्रष्ट हो जोगी ! इस प्रकार यह ग्रंथ "ग्रंथरत्न". के . रूप में सिद्ध होगा। .. परम पूज्य श्री १०८ गावराचार्य महाराज प्रार्ष परम्परा के . दृढ़ स्तम्भ हैं। समता, वात्सल्य, निम्रन्थता, आपके विशेष गुण हैं, जो भी आपके एक बार दर्शन प्राप्त कर लेता है, वह अपने आपको धन्य भानता है। .. ... स्वकल्याण के साथ-साथ अापके भाव हमेंशा पर कल्याण के भी बने रहते हैं । जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रापका विशाल संघ हैं । आपने अनेकों दीक्षायें दी हैं। वर्तमान में आपके संव में लगभग ३१ साधु हैं। जिनमें आप.ही के दीक्षित मुनियों की संख्या ही २२ है । जो भारत वर्ष में विद्यमान किसी भी श्रमगा संघ में नहीं है । यह हमारे लिए बहुत ही गौरव व प्रसन्नता की बात है कि ऐसा विशाल संथ हमारे मध्य विद्यमान है। .
परम पूज्य श्री १०८ प्राचार्य रत्न धर्म सागरजी महाराज के प्रादेशानुसार आपने देश के नगर-नगर और गाँव-गाँव में विहार कर सोनगढ़ साहित्य का बहिष्कार करने व जिन मन्दिरों से उसं साहित्य को हटाने के लिए पुर-जोर अभियान चलाया। जिसके फल स्वरूप आपने कितने उपसर्ग सहन किये ? कितने प्राणघातक हमले प्राप पर हुए ? लेकिन धर्म की रक्षा के लिए आपने-अपने प्राणों की भी तनिक चिन्ता नहीं की और जो कार्य इस दिशा में गरगधराचार्य महाराज ने किया है, उस पर हम सभी को गौरव हैं। आप सदैव ही.. निडर होकर के पूर्वाचार्यों द्वारा लिखित ग्रंथों का ही स्वाध्याय करने
की प्रेरणा देते रहे हैं। और इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु आपने इस ..विशाल ग्रंथ "गोम्मट प्रश्नोत्तर चितामरिंग" का संकलन कर प्रकाशन