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________________ २८८ ] [ गो. प्र. चिन्तामपि में प्रवीरण है । इन इन्द्रिय रूपी सर्पा तथा दुःख रूप प्राचार्य महाराज कहते हैं कि है मुने, तू आगे लिखे हुए प्रकार से सर्वज्ञ देव का स्मरण कर कि जिस सर्वज्ञ देव के ज्ञान रूप निर्मल दगा के मंडल में अनेक वस्तुत्रों से भरा हुया चराचर यह जगत प्रकाशमान है। तथा जिनका ज्ञान स्वभाव से उत्पन्न होता है, संशयादिक रहित निर्दोष है, सदाकाल उदय रूप है, तथा इंद्रियों का उल्लंघन करके प्रत्तने वाला है और लोका लोक में सर्वत्र विस्तरता है । तथा खद्योत ( जुगनू ) के समान जिसके विज्ञान रुप सूर्य की प्रभा से पीड़ित हुवे दुर्नय ( एकन्त पक्ष ) क्षण मात्र में नष्ट हो जाते हैं । तथा जिसने समस्त इंद्रों की सभा के स्थान को सिंहासन रूप किया है तथा योगी गणों से गम्य है, जगत का नाथ है, गुग्गा रुपी रत्नों का महान् समूह है । तथा पवित्र किया है. पृथ्वीतल जिसने, तथा उचरण किया है तीन जगत का जिसने ऐसा और मोक्ष मार्ग का निरुपण करने वाला है, अनन्त है और जिसका शासन पवित्र है तथा जिसने भामंडल से सूर्य को अच्छादित किया है, कोटि चन्द्रमा के समान प्रभा धारक है, जो जीवों को शरा भूत है, सर्वज जिसके ज्ञान की गति है, शान्त है, दिव्य वाणी को गरुड समान हैं, समस्त प्रभ्युदय का मंदिर है, जीवों को हस्तावलंबन देने वाला है 1 तथा सिंहासन पर स्थित है, घातक है, तथा तीन चन्द्रमा के समान मनोहर तीन छत्र सहित विराजमान हैं । तथा हंस पंक्ति के पड़ने की लीलापुर्ण चमरों के समूह से वीजित है, तृष्णा रहित है, जगत का नाथ हैं, वर का देने वाला और विश्व रूपी है। अर्थात् ज्ञान के द्वारा समस्त पदार्थों के रूप देखने वाला है। तथा दिव्य पुष्पवृष्टि, प्रानक अर्थात् दुदुभि बाजे तथा अशोक वृक्षों सहित विराजमान हैं, तथा राग रहित ( वीतराग ) है, प्रतिहार्य महालक्ष्मी से चिह्नित है, परम ऐश्वर्येकर के सहित (परमेश्र ) है । तथा १. अनंतज्ञान, २ दर्शन, ३. दान, ४ लाभ, ५. भोग, ६ उपभोग, ७ वीर्य, ८. क्षायिक सम्यक्त्व और चरित्र इन नव लव्धि रूपी लक्ष्मी की जिससे उत्पत्ति है, तथा अपने आत्मा से ही उत्पन्न है, और शुक्ल ध्यान रूपी महान अग्नि में होम दिया है कर्म रूपी इंधन का समूह जिसने ऐसा है । तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, . सम्यकं चरित्र रूप अमृत के भारतों से संसार के खेद को दूर करने वाला है, परिग्रह रहित है, जीत लिया है देस भाव जिसने ऐसा है कल्याण स्वरूप, शान्तरूप तथा सनाः तन अर्थात् नित्य रूप है । तथा ग्रहन्त है, श्रजन्मा है, अव्यक्त है अर्थात् इंद्रियगोचर नहीं हैं तथा कामंद ( मनोवांछित दाता) है काम का नाशक है, पुराण पुरुष है, देव समुद्र में पड़ते हुए काम रूप हस्ती का
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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