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________________ .... nwar अध्याय : दसवां ] [ ६६५ होना तो मिथ्यादृष्टिपना ही है। यहां कोई पूछे कि व्रत समिति तो शुभ कार्य हैं, उनको पालने पर भी पापी क्यों कहा ? ___ उसका समाधान -सिद्धान्त में मिथ्यात्व को ही पाप कहा है, जहां तक मिथ्यात्व रहता है, वहां तक शुभ अशुभ सभी क्रियाओं को अध्यात्म में परमार्थ से पाप ही कहा है और व्यवहारनय की प्रधानता में व्यवहारी जीवों को अशुभ से छुड़ाकर शुभ को लगाने की किसी तरह पुण्य भी कहा है । स्याद्वादमत में कोई विरोध नहीं है ! फिर कोई पूछे कि परद्रव्य से जब तक राग रहे तब तक मिथ्यादृष्टि कहा है. सो इसको हम नहीं समझे, क्योंकि अविरत सम्यग्दृष्टि आदि के चरित्र मोह के उदय से रागादिभाव होते हैं, उसके सभ्यत्व किस तरह कहा है ? . उसका समाधान----यहां मिथ्यात्व सहित अनंतानुबंधी का राग प्रधान करके कहा है, क्योंकि अपने और पर के ज्ञान श्रद्धान के बिना परद्रव्य में तथा उसके निमित्त से हुये भावों में प्रात्मबुद्धि हो तथा प्रीति अप्रीति हो तब समझता कि इसके भेदज्ञान नहीं हुआ। मुनि पद लेकर व्रत समिति भी पालता है, वहां पर जीवों की रक्षा तथा शरीर सम्बन्धी यत्न से प्रवर्तना, अपने शुभ भाव होना इत्यादि परद्रव्य संबंधी भावों से अपना मोक्ष होना माने और पर जीवों का घात होना, प्रयत्नाचार रूप प्रवर्तना अपना अशुभ भाव होना इत्यादि परद्रव्यों की क्रिया से ही अपने में बंध माने तब तक जानना कि इसके अपना और पर का ज्ञान नहीं हुअा, क्योंकि बंध मोक्ष तो अपने भावों से था, परद्रध्य तो निमित्त मात्र था, उसमें विपर्यय माना, इसलिए परद्रव्य से ही भला बुरा मान रागद्वेष करता है, तब तक सम्यग्दृष्टि नहीं है । और जब तक चारित्र मोह के रागादिक रहते हैं, उनको तथा उनसे प्रेरित परद्रव्य संबंधी शुभाशुभ क्रिया में प्रवृत्तियों को ऐसा मानता है कि यह कर्म का जोर है, इससे निवृत होने से ही मेरा भला है, उनको रोग के समान जानता है, पोड़ा सही नहीं जाती, तब उनका इलाज करने रूप प्रवर्तता है, तो भी इसके उनसे राग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जो राम मानें उसके राग कैसा ? उसके मेटने का ही उपाय करता है, सो मेटना भी अपने ही ज्ञान परिणामरूप परिणमन से मानता है। इस तरह परमार्थ अध्यात्मदृष्टि से यहां व्याख्यान जानना ! मिथ्यात्व के बिना चारित्र मोह संबंधी उदय के परिणाम को यहां राग नहीं कहा, इसलिए सम्यग्दृष्टि के ज्ञान वैराग्यशक्ति का होना अवश्य कहा है । मिथ्यात्व सहित राग को ही रांग कहा गया है, वह सम्यग्दृष्टि
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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