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अध्याय : नौवां ]
३. स्वेट ७६ हजार रहते हैं ।
४. सर्वड २४ हजार रहते हैं ।
५, मडम्ब ४ हजार रहते हैं ।
६. पट्टण ४८ हजार रहते हैं ।
७. द्रोण ६६ हजार रहते हैं । ८. संवाहन ७४ हजार रहते हैं ।
8. दुर्गाटवी २८ हजार रहते हैं ।
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नदी और पर्वतों से वेष्ठित रहने वाले गांव को 'खेट' कहते हैं ।
पर्वतों से वेष्ठित गांव को 'खर्वड' कहते हैं । हरेक पांच सौ ग्राम संयुक्त रहने वाले गांव की 'स्व' कहते हैं |
जहां रत्न उत्पन्न होते हैं, उस गाँव को 'पट्टा' कहते हैं ।
नदी से वेष्ठित हुए ग्राम को 'द्रोण' कहते हैं । उपसमुद्र के तट पर रहने वाले ग्राम को 'संवाहन' कहते हैं ।
पर्वतों पर रहने वाले गांवों को 'दुर्गावी' कहते हैं ।
एक-एक देश में एक-एक समुद्र रहता है। उन समुद्रों में टापू प्रर्थात् ५६ अन्तद्वीप हैं और जहां रत्न उत्पन्न होते हैं, ऐसे २६ हजार रत्नाकर (समुद्र) हैं, और रत्न बिक्री के स्थान भूत ऐसे ६०० प्रत्यन्तर कुक्षी हैं और ७०० प्रत्यन्तर कुक्षीवास हैं, और ८०० कक्षा हैं। भरत खंड के मुख-नगर (राजधानी) दोनों नदी (गंगा और सिन्धु महानदी ) के बीच में विद्यमान श्रार्य खंड में होता है । चक्रवर्ती के परिवारादि वैभवों का वन
१. चक्रवर्ती के एक पट्टरानी के सिवाय सौर १६ हजार स्त्रियां होती हैं । इनमें आर्य खंड की ३२ हजार राजकन्याएं होती हैं, ३२ हजार विद्याघर- राजकन्यायें और म्लेच्छ खंड की ३२ हजार राजकन्याएं होती हैं । इस प्रकार सब मिलकर ६६ हजार स्त्रियां होती हैं ।
२. चक्रवर्ती रात्रि के समय अपनी पट्टरानी के महल में ही रहते हैं परन्तु पट्टरानी के पुत्र, संतान नहीं होतीं है, वह बंध्या ही रहती है। इसकी शंखावर्त योनि होने से इस योनि में वंशोत्पत्ति नहीं होती है । चक्रवर्ती अपनी पृथक् विक्रिया की सहायता से अपने शरीर के अनेक रूप धारण कर सकते हैं, इसलिये उनकी अन्य स्त्रियों को पुत्रादिक होते रहते हैं ।