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________________ अध्याय : दसवां ] [ Ree प्रभाव कहना वृथा है । सांख्य दर्शन वाले ऐसा कहते हैं कि जो एकदम सोने की water है, वही मोक्ष है । जिस जगह न सुख है, न ज्ञान है ऐसी प्रतीति का निवारण किया ऐसा कहते हैं कि जहां से मुक्त हुआ वहीं पर ही तिष्ठता है ऊपर को गमन नहीं करता ऐसे नैयायिक के कथन का लोक शिखर पर तिष्ठता है । इस aar से निषेध किया, जहां बंधन से छूटता है, वहां वह नहीं रहता, यह प्रत्यक्ष देखने में आता है । जैसे :-- कैदी जब कैद से छूटता है । तब बंदीगृह से छूटकर अपने घर की तरफ गमन करता है । वह निजघर निर्धारण ही है । जैन-मार्ग में इन्द्रियजनित ज्ञान जो कि मति, श्रुत, अवधि मन:पर्यय है उनका अभाव माना है । और अतीन्द्रिय रूप जो केवल ज्ञान है । वह वस्तु का स्वभाव है । उसका प्रभाव आत्मा में नहीं हो सकता है। स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द रूप इन पांच इन्द्रिय विषयों कर उत्पन्न हुए सुख का तो प्रभाव ही है। लेकिन प्रतीन्द्रिय सुख जो निराकुल परमानंद है । उसका प्रभाव नहीं है । कर्मजनित जो इन्द्रादिक दश प्रारण अर्थात् ५ इन्द्रियां मन वचन काय या श्वाच्छोश्वास इन दश प्रारणों का भी प्रभाव है । ज्ञानादि निज प्राणों का अभाव नहीं है । जीव की शुद्धता का प्रभाव है। शुद्धपने का अभाव नहीं यह निश्चय से जानना | प्रश्न :- अगर जो मोक्ष उत्तम सुख नहीं दे, तो सिद्ध उसे निरंतर क्यों सेवन करें ? मुक्खु न होइ । उत्तर :- उत्तम सुक्खु र देइ जर उस तो कि सलु कि कालु जिय सिद्ध वि सेर्वाह सोइ ।।२१२३ ।। आगे कहते हैं कि जो मोक्ष उत्तम सुख नहीं दे तो सिद्ध उसे निरंतर क्यों सेवन करें ? 'यदि' जो 'उत्तम सुख' उत्तम अविनाशी सुख को 'न ददाति' नहीं देवे तो 'मोक्षः उत्तमः ' मोक्ष उत्तम भी 'न भवति' नहीं हो सकता, उत्तम सुख देता है । इसीलिए मोक्ष सबसे उत्तम है। जो मोक्ष में परमानंद नहीं होता 'ततः' तो 'जीव' हे जीव 'सिद्धा अपि सिद्ध परमेष्ठी भी 'सकलमपि कालं' सदा काल 'तमेव' उसी मोक्ष को 'कि सेवते' क्यों सेवन करते ? कभी भी न सेवते । भावार्थ--- वह मोक्ष प्रखंड सुख देता है, इसीलिये उसे सिद्ध महाराज सेवते हैं । मोक्ष परम आल्हादरूप है, अविश्वर है । मन और इन्द्रियों से रहित है, इसीलिये उसे सदाकाल सिद्धसेवते हैं । केवलज्ञानादि गुण सहित सिद्ध भगवान् निरंतर निर्वाण में ही निवास करते हैं । ऐसा निश्चित है । सिद्धों का सुख दूसरी जगह भी ऐसा कहा
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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