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[ गो. प्र. चिन्तामणि है। "प्रात्मोपादान" इत्यादि इसका अभिप्राय यह है कि इस अध्यात्मशान' से सिद्धों के जो परमसुख हुआ है। बह कैसा है? कि अपनी-अपनी जो उपादान शक्ति है, उसी से उत्पन्न हुआ है । पर की सहायता से नहीं है स्वयं (आप ही) अतिशयरूप है। सब बाधाओं से रहित है, निराबाध है, विस्तीर्ण है, घटती बढती से रहित है, विषय 'विकार से रहित है। भेदभाव से रहित है, निर्द्वन्द है, जहां पर वस्तु की अपेक्षा ही नहीं है, अनुपम है । अमन है अपार है, जिसका प्रमारण नहीं सदा काल शाश्वत है। महा उत्कृष्ट है, अनंत सारता लिये हुये है, ऐसा परमसुख सिद्धों के है । अन्य के नहीं है । यहाँ तात्पर्य यह है कि हमेशा मोक्ष का ही सुख अभिलाषा' करने योग्य है। और संसार पर्याय 'सब हेय हैं। क्या सभी पुरुषों के मोक्ष ही ध्याय पोय हैं ?
तिहयरिण जीवह अप्यि रवि सोक्सह कारणु कोई । भुक्खु मुएविणु सक्कु पर तेषवि विसहि सोर ।।२१२४॥
अब तीन लोक में मोक्ष के सिवाय अन्य कोई भी परम सुख का कारण नहीं ..है। ऐसा निश्चय करते हैं
.. 'त्रिभुवने' तीन लोक में 'जीवाना' जीवों को 'मोक्ष मुक्त्वा मोक्ष के सिवाय 'किमपि' कोई भी वस्तु 'सुखस्य कारणं' सुख का कारण . 'नैव' नहीं है । 'अस्ति' है। एक सुख का कारण मोक्ष ही है । 'तेन' इस कारण तू 'परं एक त एव' नियम से एक मोक्ष का ही विचितय' चितवन कर , जिसे कि महा मुनि भी चितवन करते हैं। . ... भावार्थ :--श्री योगींद्राचार्य प्रभाकर भट्ट से कहते हैं कि वत्स, मोक्ष के . सिवाय अन्य सुख का. कारण नहीं है। और आत्म--ध्यान के सिवाय अन्य मोक्ष का कारण नहीं है । इसलिये तू बीतराग निर्विकल्प समाधि में ठहर कर निज शुद्धात्म स्वभाव को ही ध्या। यह श्री गुरु ने आज्ञा की। तब प्रभाकर भट्ट ने विनती की, हे भगवान तुमने निरंतर भतीद्रिय मोक्ष सुख का वर्णन किया है सो ये जगत के प्राणी अतीन्द्रिय सुख को जानते ही नहीं है । इन्द्रिय सुख को ही मानते हैं । तब गुरू ने कहा कि हे प्रभाकर भट्ट कोई एक पुरुष जिसका चित्त व्याकुलता रहित है । और पंचेन्द्रिय . के भोगों से रहित अकेला स्थित है, उस समय किसी पुरुष ने पूछा तब उसने कहा कि सुख से तिष्ठ रहे हैं उस समय विषय सेवनादि सुख तो है ही नहीं, उसने यह न्यो । कहा कि हम सुखी हैं ।
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