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अध्याय : दसवां ] गया, तथा वीतराग भाव प्रबल हुआ, वहां पर स्वसंवेदन ज्ञान का अधिक प्रकाश हुअा, परन्तु चौथी चौकड़ी बाकी है, इसलिए छठे गुणस्थान वाले मुनि सरागसंयमी : हैं, वीतराग संयमी के जैसा प्रकाश नहीं है । सातवें गुणस्थान में चौथी चौकड़ी मदः . हो हाही है, वहां पर प्रहार विहार क्रिया नहीं होती, ध्यान में प्रारुद रहते हैं, सातवें से छठे गुणस्थान में प्राबें, तब वहां पर आहारादि क्रिया है, इसी प्रकार छट्ठा सातवां करते रहते हैं, वह पर अंतर्मुहूर्त काल है । पाठवें गुरणस्थान में चौथी चौकड़ी, अत्यन्त मन्द हो जाती है, वहां राग भाव की अत्यन्त क्षीणता होती है, वीतराग भाद पुष्ट होता है, स्वसंवेदन शान का विशेष प्रकाश होता है। शेणी मांडने से शुक्ल ध्यान उत्पन्न होता है।
श्रेणी के दो भेद हैं, एक क्षपक दूसरी उपशम, क्षपक श्रेणी वाले तो उसी भव में केवलज्ञान पाकर मुक्त हो जाते हैं, और उपशम वाले पाठवें नवमें दशमें से ग्यारहवां स्पर्शकर पीछे मूड़ जाते हैं, सो कुछ-एक भव भी धारण करते हैं, तथा क्षपक याले आठ से नवमें गुरणस्थान में प्राप्त होते हैं, वहां कषायों का सर्वथा नाश होता है, एक सज्वलनलोभ रह जाता है, अन्य सबका अभाव होने से वीतराग भाव अति प्रबल हो जाता है, इसलिए स्वसंवेदन ज्ञान का बहुत ज्यादा प्रकाश होता है, परन्तु एक संज्वलन लोभ बाकी रहने से वहां सराग नारित्र ही कहा जाता है । दशवें गुरण स्थान में सूक्ष्म लोभ भी नहीं रहता, तब मोह की अट्ठाईस प्रकृतियों के नष्ट हो जाने से वीतराग चारित्र की सिद्धि हो जाती है । दसवें से बारहवें में जाते हैं, · ग्यारहवें गुगास्थान का स्पर्श नहीं करते, वहां निमोह वीतरागी के शुक्ल ध्यान का दूसरा पाया (भेद) प्रगट होता है, यथाख्यात चारित्र हो जाता है ।
बारहवें के अंत में ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अंतराय, इन तीनों का विनाश. कर डाला, मोह का नाश पहले हो ही चुका था, तब चारों धालिया कर्मों के नष्ट हो जाने से तेरहवें मुरणस्थान में केवल ज्ञान प्रगट होता है, वहां पर ही शुद्ध परमात्मा होता है, अर्थात् उसके ज्ञान का पूर्ण प्रकाश हो जाता है, निःकषाय है । चौथे गुणस्थान से लेकर बारहवें गुणस्थान तक तो अंतरात्मा है। उसके गुणस्थान प्रति चढ़ती हुई शुद्धता है, और पूर्ण शुद्धता परमात्मा के है, यह सारांश समझना ।
: परमात्मप्रकाश, प्रा. योगी १. नं. १६ गा. १२
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