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अध्याय : दुसरा ]
ग्रही पद्धति तत्त्वार्थ श्रद्धान रूप लक्षण में भी संघटित करना चाहिये, क्योंकि २४ द्रव्यलिंगी अपने क्षयोपशम के अनुसार तत्वार्थ का ज्ञान प्राप्त कर उसकी श्रद्धा करता
है, बुद्धिपूर्वक अश्रद्धा की किसी बात को आश्रय नहीं देता, तत्वार्थ का ऐसा विशद विशद व्याख्यान करता है कि उसे सुनकर अन्य मिश्यादृष्टि सम्यग्दृष्टि हो जाय, परन्तु परमार्थ से वह स्वयं मिथ्यादृष्टि ही रहता है । उसकी श्रद्धा में कहां चूक रहती ना है, यह प्रत्यक्ष ज्ञानी जान सकते हैं । इतना होने पर भी यह निश्चित है कि करणानुयोग या प्रतिपादित सम्यग्दर्शन की प्राप्ति तत्त्वार्थ-श्रद्धानपूर्वक होगी । अतः कारण में कार्य का उपचार कर इसे सम्यग्दर्शन कहा है ।
स्थूल रूप से शरीर भिन्न है, पारमा भिन्न है" ऐसा स्वपर का भेदविज्ञान द्रव्यलिगी मुनि को भी होता है। द्रव्यालगी मुनि, पानी में पेल दिये जाने पर भी संक्लेशं नहीं करता और शुक्ल लेश्या के प्रभाव से नौवें ग्रैवेयक तक में उत्पन्न होने की योग्यता रखता है, फिर भी बह मिथ्यादृष्टि रहता है । उसके स्वपर भेदविज्ञान में जो सूक्ष्म चूक रहती है, उसे जनसाधारण नहीं जान सकता [ वह चूक प्रत्यक्ष ज्ञान का ही विषय है । इस स्थिति में यह कहा जा सकता है कि करगानुयोग प्रतिपादित सम्यग्दर्शन इससे भिन्न है, परन्तु उसकी प्राप्ति में स्वपर का भेदविज्ञान कारण पड़ता है। अतः कारणा में कार्य का उपचार कर उसे सम्यग्दर्शन कहा है ।
कपाय की मादता से उपयोग की चञ्चलता दूर होने लगती हैं, उस स्थिति में द्रालगी मुनि का उपयोग भी पर पदार्थ से हटकर स्व में स्थिर होने लगता है। स्व द्रव्य-यात्म द्रव्य की वह बड़ी सूक्ष्म चर्चा करता है । यात्मा के ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव का ऐसा भाव-विभोर होकर वर्णन करता है कि अन्य मिथ्यादृष्टि जीवों को भी यात्मानुभव होने लगता है, परन्तु वह स्वयं मिथ्यादृष्टि रहता है । इस स्थिति में इस यात्मश्रद्धान को करुणानुयोग प्रतिपादित सम्यग्दर्शन का साधन मानकर सम्यग्दर्शन कहा गया है ।
इन सब लक्षणों में जो सूक्ष्म चूक रहती है. उसे छमस्थ जान नहीं सकता, इसलिये व्यवहार से इन सत्रको सम्यग्दर्शन कहा है। इनके होते हुए सम्यक्त्व का धात करने वाली सात प्रकृतियों का उपशमादिक होकर करणानुयोग प्रतिपादित सम्यग्दर्शन प्रकट होता है। देव-शास्त्र-गुरु की प्रतीति; तत्त्वार्थ श्रद्धान, स्वपर श्रद्धान और प्रात्म
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