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________________ ६४ ] : [ गो. प्र. चिन्तामणिः श्रद्धान ये चारों लक्षा एक दूसरे के वाधक नहीं हैं, क्योंकि एक के होने पर दूसरे लक्षमा स्वयं प्रगट हो जाते हैं । पात्र की योग्यता देखकर प्राचार्यों ने विभिन्न शैलियों से वर्णन मात्र किया है । जैसे पाचरण प्रधान शैली को मुख्यता देने की अपेक्षा देव शास्त्र-गुरु की प्रतीति को, ज्ञान प्रधान शैली को मुख्यता देने की अपेक्षा तत्त्वार्थ श्रद्धान की और कपाय जनित विकल्पों की मन्दमन्दतर अवस्था को मुख्यता देने की अपेक्षा स्वपर श्रद्धान तथा प्रात्म अहान को सम्यग्दर्शन कहा है ! अपनी योग्यता के ग्रानुसार चारों शैलियों को अपनाया जा सकता है । इन चारों शैलियों में भी यदि मुख्यता और अमुख्यता की अपेक्षा चर्चा की जाये तो तत्त्वार्थ श्रद्धान रूप प्रधान शैली मुख्य जान पड़ती है, क्योंकि उसके होने पर ही शेष तीनों शैलियों को बल मिलता है। प्रश्न :-सम्यग्दर्शन फिसे प्राप्त होता है ? उत्तर :----मिथ्यादृष्टि दो प्रकार के हैं---एक अनादि मिथ्यावृष्टि और दूसरे सादि मिथ्यादृष्टि । जिसे आज तक कभी सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं हुआ है, वह अनादि मिथ्यादष्टि है और जिसे सम्यग्दर्शन प्राप्त होकर छूट गया है, वह र सादि मिथ्याष्टिं जीव है। अनादि मिश्यादृष्टि जीव के मोहनीय कर्म की छब्बीस प्रकृतियों की सत्ता रहती है, क्योंकि दर्शन मोहनीय की मिथ्यात्व सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति इन तीन प्रकृतियों में से एक मिथ्यात्व 'प्रकृति का ही बन्ध होता है, शेष दो का नहीं । प्रथमोपणाम सम्यग्दर्शन होने पर पर उसके प्रभाव से यह जीव मिथ्यात्व प्रकृति के मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति के भेद में तीन खण्ड करता है, इस तरह मादिक मिथ्यादृष्टि जीव के ही सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति की सत्ता हो सकती हैं। सादि मिथ्यादृष्टि जीवों में मोहनीय कर्म की सत्ता के तीन विकल्प बनते हैं-एक २८ प्रकृति की सत्तावाला, और दूसरा २७ प्रकृति की सत्ता बाला और तीसरा २६ प्रकृतियों की संता बाला । जिस जीव के दर्शन । मोह की तीनों प्रकृतियां विद्यमान है, वह अट्ठाइस प्रकृतियों की सत्ता बाला है । जिस जीब ने. सम्यास्त्र प्रकृति की उद्वेलना कर दी है, यह सत्ताईस प्रकृतियों की सत्ता वाला है और जिसने सम्यक्त्व मिथ्यास्त्र प्रकृति की उद्वेलना कर ली है, वह छवीस प्रकृतियों को सत्ता बाला है। . .marge............... ....me
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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