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________________ FASTHAN :: . . . : अध्याय : दूसरा ] प्रश्न :--सम्यग्दर्शन के कितने भेद हैं ? सम्यग्दर्शन के औषशामिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक इस प्रकार तीन भेद है । यहाँ सर्व प्रथम औप शमिक सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति की अपेक्षा विचार करते हैं; क्योंकि अनादि मिथ्यादृष्टि को सर्व प्रथम प्रौपमिक सम्यग्दर्शन हो प्राप्त होता है | ऑपशमिक सम्बग्दर्शन भी प्रथमोपशम और द्वितीयोपशम के भद से दो प्रकार का है। यहाँ प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन की चर्चा हैं । . द्वितीयोपशम की चर्चा आगे की जायेगी। इसना निश्चित है कि सम्यग्दर्शन संजो पञ्चेन्द्रिय परितक भव्य जीव को ही होता है; अन्य को नहीं । भव्यों में भी उसी को होता हैं, जिसका संसार भ्रमणं का ल. अगदात पावन के साल से बाधिक बाकी नहीं है। लेश्यानों के विषय में में कोई लेश्या हो और देव तथा नारंकियों के जहाँ जो लेश्या बतलाई है, उसी में ... गोपशमिक सम्यग्दर्शन हो सकता है। सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिये गोत्र का प्रति- . बन्ध नहीं है अर्थात् जहाँ उच्च-नीच गोत्रों में से जो भी संभव हो, उसी गोत्र में सम्यग्दर्शन हो जाता है । कर्म स्थिति के विषय में चर्चा यह है कि जिसके बध्यमान . कमाँ को स्थिति अन्तः कोड़ा कोड़ी सागर प्रमाण हो तथा सत्ता में स्थित कर्मों की . स्थिति संख्यात हजार सागर कम अन्तः कोड़ा कोड़ी सागर प्रमाण रह गई हो, वही सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकता है, इसी प्रकार जिसके अप्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग द्रिस्थानगत और प्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग चतुः स्थानगत होता है, वही औपमिक सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकता है । यहाँ इतनी विशेषता और भी ध्यान में रखना चाहिये कि जिस सादि मिश्यावृष्टि के आहारक शरीर और ग्राहारक शरीराङ्गोपाङ्ग को .. र सत्ता होती है, उसे प्रश्रमोपशम सम्बग्दर्शन नहीं होता । अनादि मिथ्यांदृष्टि के इनकी . सत्ता होती ही नहीं है। इसी प्रकार प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन से च्युत हुमा जीव दूसरे प्रथमोपशम सम्पबत्व को तब तक प्राप्त नहीं कर सकता जब तक कि वह वेदक काल में रहता है। वेदक काल के भीतर यदि उसे सन्यादर्शन प्राप्त करने का अवसर प्राता है तो यह बेदक क्षायोपशामिक सम्यग्दर्शन ही प्राप्त करता है 1. वेदक काल के विषय.. में यह कहा गया है, कि सम्यग्दर्शन से च्युत हुआ जो मिथ्यादृष्टि जीव, एकेन्द्रिय . पर्याय में भ्रमण करता है वहीं संज्ञी पञ्चेन्द्रिय होकर प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन को तभी सन का
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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