________________
...
.....
.....................
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्राप्त कर सकता है, जब उसके सम्यक्त्व तथा लम्याइ मिथ्यात्व इन दो. प्रकृतियों की स्थिति एक. सागर से कम शेष रह जावे । यदि इससे अधिक स्थिति शेष है, तो नियम से उसे बेदक-क्षायोपशभिक सम्यग्दर्शन ही हो सकता है । यदि सम्यग्दर्शन से च्युत हुयाः। जीब बिकलय में परिभ्रमण करता है, तो उसके सम्यक्त्व और सम्य मिथ्यात्व प्रकृति की स्थिति पृथकत्व सागर प्रमाण शेष रहने तक उसका वेदक काल कहलाता
है। इस काल में यदि उसे सम्यग्दर्शन प्राप्ति का अवसर प्राता है, तो नियम से वेदक .. क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन को ही प्राप्त होता है। हाँ, सम्यक्त्व प्रकृति की अथवा .. सम्यक्त्व प्रकृति और सम्पङ मिथ्यात्व प्रकृति दोनों की उद्वेलना हो गई है, तो ऐसा
जीव पुनः सम्यग्दर्शन प्राप्त करने का अवसर आने पर प्रथमोपणम सम्यक्त्व को प्राप्त होता है। .
.
. . . तात्पर्य यह है कि अनादि मिथ्यादृष्टि जीव के सर्व प्रथम प्रथमोपशम, सम्यग्दर्शन हो होता है और सादि मिथ्यावृष्टियों में २६ या २७ प्रकृतियों की सत्ता वाले जीव के दूसरी बार भी प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन होता है, किन्तु २८ प्रकृति की सत्ता काले जीव के वेदक काल के भीतर दूसरी बार. सम्यग्दर्शन हो तो वेदक-क्षायोपामिक ही होता है। हां, वेदक काल के निकल जाने पर प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन के होता है।
इस प्रकार सम्यग्दर्शन प्राप्त करने की योग्यता रखने वाला संज्ञी पञ्चेन्द्रियः पर्याप्तक, विशुद्धि युक्त, जागृत, साकार उपयोग युक्त, चारों गति वाला भव्य जीवं जब सम्बग्दर्शन धारण करने के सम्मुग्न होता है, तब क्षायोपशमिक, विशुद्धि, देशना.. प्रायोग्य और करण इन पांच लधियों को प्राप्त होता है।
सा हा .. चददि भन्यो ‘सणी पज्जन्तो सुज्झगो. यसागारो । जागारो सल्लेस्सों. : सलद्धिगो सम्मभुपंगमई ॥६५॥जो.का. खउठवसमिय विसोही देसण पाउम्ग करण लद्धी च । चत्तारि वि सामरणा करणं पुरण होदि सम्मत्ते ॥६५०।।जी.का..
इनमें करण लब्धि को छोड़कर शेष चार लब्धियां सामान्य है अर्थात् भव्य और अभव्य दोनों को प्राप्त होती हैं, परन्तु करगालधि भव्य जीव को ही प्राप्त होली है। उसके प्राप्त होने पर सम्यग्दर्शन नियम से प्रकट होता है।
.....
..
MM...