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[ गो. प्र. चिन्तामणि किया जा सकता। इस जीव का पुरुषार्थ चरगानुयोग और द्रव्यानुयोग में प्रतिपादित सम्यग्दर्शन को प्राप्त करने के लिये ही अग्रसर होता है । अर्थात् वह बुद्धिपूर्वक परमार्थ । देव शास्त्र गुरु की शरण लेता है, उनकी श्रद्धा करता है और आगम का अभ्यास कर तत्वों का निर्णय करता है । इन सबके होते हुए अनुकूलता होने पर कशानुयोग प्रतिपादित सम्यग्दर्शन स्वतः प्राप्त होता है और उसके प्राप्त होते ही यह संवर और निर्जरा को प्राप्त कर लेता है। ... प्रश्न : सम्यादर्शन के पांच लक्षण माने गये हैं, वे कौनसे हैं ? उत्तर :- (१) परमार्थ देव शास्त्र-गुरु की प्रतीति ।
(२) तत्त्वार्ध श्रद्धान । (३) स्वपर का श्रद्धान। (४) आत्मा का श्रद्धान । (५) सप्त प्रकृतियों के उपशम, क्षयोपशम अथवा क्षय से प्राप्त श्रद्धा गुग्गा
की निर्मल परिणति ।
इन लक्षणों में पांचवां लक्षणा साध्य है और शेष चार साधन हैं । जहाँ इन्हें सम्यग्दर्शन कहा है, वहां कारग में कार्य का उपचार समझना चाहिये । जैसे अरहंत देव, तत्प्रणीत शास्त्र और निम्रन्थ गुरु की श्रद्धा होने से व कुदेव, कुशास्त्र और कुगुरु की श्रद्धा दूर होने से गृहीत मिथ्यात्व का प्रभाव होता है, इस अपेक्षा से ही इसे सम्यग्दर्शन कहा है, सर्वथा सम्यग्दर्शन का बह लक्षणा नहीं है । क्योंकि द्रव्यलिंगी मुनि । आदि व्यवहार धर्म के धारक मिथ्याद्रष्टि जीवों के भी परहतादिक का (सामान्य) श्रद्धान होता है । अथवा जिस प्रकार अणुव्रत, महावत धारण करने पर देश चारिन । सकल चारित्र होता भी है और नहीं भी होता है । परन्तु अणुव्रत और महाव्रत धारण - किये बिना देशचारित्र, चारित्र कदाचित् नहीं होता है, इसलिये अणुव्रत, . महावत को अन्वयरूप कारण जानकर कारग में कार्य का उपचार कर इन्हें देश चारित्र, सकलचारित्र कहा है । इसी प्रकार अरहन्त देवादिक का श्रद्धान होने पर सम्मरदर्शन होता भी है और नहीं भी होता है, परन्तु अरहन्तादिक की श्रद्धा के बिना सम्यग्दर्शन कदापि नहीं होता, इसलिये अन्वयव्याति के अनुसार कार में कार्य का उपचार कर इसे सम्यग्दर्शन कहा है।
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-v.ran
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