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________________ अध्याय : ग्यारहवा ] [ १०३.१ कर्म कर्म हिताबन्धि, जोको जोहित स्पृहः । स्व स्व प्रभाव यस्त्वे, स्वार्थ को वा न वाञ्छति ॥२१७६॥ Karma works in its own cause that means karma; produces karina the soul works for its own good, that is to say fight against the karmic Power, Who is there in there in the world that wiil not work for his own good when he has the power to do so? : कर्म-कर्म का हित चाहते हैं। जीव-जीव का हित चाहता है। जीव कभी बलवान होता तो कभी कर्म बलवान हो जाता है। इस तरह दोनों का अनादि से ही बैर चला पा रहा हैं। बलवान् भाग्य जब उदय में आता है तब जीव में मिथ्यात्व आदि भाव को पैदा कर अपनी संतान को पुष्ट कर जीध को अपने अधीन कर लेता है । जो अनादि काल से एकेन्द्रिय जीव निगोद राशि में पड़ जाते है भाग्य की तीन यातना सह रहे हैं, वे बेचारे क्या पुरुषार्थ करेंगे ? 'जब तक एकेन्द्रिय से असंझी . पंचेन्द्रिय तक पर्याय को धारण करते रहते हैं, तब तक शुभ पुरुषार्थ भी नहीं कर सकते हैं संज्ञी पर्याप्तक पंचेन्द्रिय जीव भी जब तक भाग्य तीन बंध, उदय, संत्व रहता उसको भी शुभं पुरुषार्थ करने की योग्यता नहीं होती। जिन कर्मों की स्थिति अंतः कोडा-कोडी सागर से अधिक होती है, उसके प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन की प्राप्ति सम्भव नहीं जो कि शुभ पुरुषार्थ को प्राथमिक अवस्था है । किन्तु जिनके बन्ध को प्राप्त होने वाले कर्मों की स्थिति अन्त कोडा-कोडो सागर प्रमाण प्राप्त होती है और सत्ता में स्थित कर्मों की स्थिति संख्यात हजार सागर कम अन्तः कोडा-कोडी सागर शेष रह जाती है वही प्रथमोपशम सम्यक्त्व प्राप्त कर सकते हैं और जब तक सम्यक्त्व प्राप्त नहीं होता तब तक मोक्ष के लिये कुछ भी पुरुषार्थ . नहीं हो सकता। अतः पुरुषार्थ भी सदैव भाग्य की सहायता चाहता रहता है सिर्फ उदय के समय में ही भाग्य अपना प्रभाव दिखाता है ऐसी बात नहीं किन्तु सत्ता एवं निर्जरा के बाद भी अपना प्रभाव डालता है । यदि बद्धमान नरक तिर्यञ्च प्रायु है, तब वह जीव अणुनत वा महावत धारण नहीं कर सकता। सातवें नरक से प्राया हुआ जीव मोक्ष नहीं जा सकता है।. . . व्यवहार में भी दैनन्दिन अनुभव सिद्ध दैव पुरुषार्थ का कार्य वाणिज्य में, शिक्षा क्षेत्र में, कृषि आदि में देखने में आते हैं। समान पुरुषार्थ करने वालों में भी ....sinalitiewNITION
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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