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[ गो, प्र. चिन्तामणि है जो कार्य अनुकूल हो या प्रतिकूल हो. यदि वह अतर्कितोपस्थित है अर्थात् उस २ कार्य को करने का विचार रहित (अबुद्धि पूर्वक) है तो ऐसी स्थिति में वहीं पुरषार्थ की गौणता एवं भाग्य की प्रधानता मानी जायेगी अर्थात् इस स्थिति में जो कार्य होता है उसको भाग्य कृत कहेंगे । बुद्धि पूर्वक जो भी कार्य है और उसमें जो सफलता मिलती है, उस समय वहां पुरुषार्थ प्रधान एवं दैव गौण माना जाता है। इस स्थिति में जो कार्य होता है. उसको पुरुषार्थ से हुआ कहेंगे इस तरह अबुद्धिपूर्वक जीव. को जो सुख दुःखादिक होते हैं वह देव की प्रधानता से होते हैं तथा बुद्धिपूर्वक जो लाभ अलाभ, श्रादि जीव को होते हैं पुरुषार्थ की प्रधानता से होते हैं । इस प्रकार दोनों की प्रधानता एवं भासता से ही कार्य पनसा है .. अनुकूल देव और अनुकूल पुरुषार्थ, प्रतिकूल देव और प्रतिकूल पुरुषार्थ होने पर भी एक मुख्य और एक गौरा रहता है । . ... .. . ... . ..
एकनाकर्षन्ती म्लथयान्तो वस्तुतत्व . मितरेण । अन्तेनः जयति जैनोमन्थान नेत्र मिव गोपी ॥२१७७॥
जिस तरह ग्वालिनी मक्खन बनाने रूप कार्य की सिद्धि के लिये दही के हांडि में मथानी चलाती हैं और उसकी रस्सी को जिस प्रकार एक हाथ से अपनी ओर खींचती है, उस समय दूसरा हाथ शिथिल कर देती है और फिर जब दूसरे से अपनी ओर खींचती है, तब पहिला शिथिल करती है; एक. को खींचने पर दूसरे को सर्वथा छोड़ नहीं देती। यदि सर्वथा छोड़ देगी तो मक्खन निकलने की बात तो दूर
रहे उसी को एक हांडि या खप्पर रूप में परिणाम हो जायेंगे । मक्खन तो खा नहीं २ सकेगी वरं सब दहि जमिन खा लेगी । जिस समय दाहिने हाथ की अोर रस्सी को
खींचती है उस समय उस प्रोर की रस्सी ज्यादा सक्रिय रहती है एवं बाये हाथ को रस्सी शिथिल रहती है, किन्तु निष्क्रिय नहीं रहती । यदि निष्क्रिय रहती तो उस ओर की रस्सी को भावश्यकता को छोड़ देना चाहिये किन्तु सर्वथा छोड़ने पर कार्य नहीं होता । इसी प्रकार भाग्य कृत में पुरुषार्थ शिथिल एवं पुरुषार्थ कृत में भाग्य शिथिल रहता है। पूर्ण निष्क्रिय या अभाव नहीं रहता । इसी प्रकार स्यावाद कथन भी सौग मुख्य की अपेक्षा से है। जब भास्य बलशाली रहता है तब वह अपना प्रभाव दिखाता है एवं जब पुरुषार्थ बलशाली रहता है, तब वह अपना प्रभाव दिलाये बिना नहीं रहता है ।
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