SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 1047
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय: दसवां ] प्रश्न : --- यह लोक किसके प्राधार से है ? उत्तर :-- यह लोक घनोदधिवात, धन्रवात और तनुवात के श्राधार से है । अर्थात् यह लोक धनोदधि नाम की घनी भूत वायु से घिरा है। उसी के आधार पर ठहरा हुआ है, चोदधिवायु बनवायु के आधार सेहैं, धनवायु तनुवायु के आधार से है और तनुवायु श्राकाश के आधार से है तथा आकाश स्वयं अपने आधार से है, सो ही सिद्धांतसार में पहले अधिकार में लिखा है घनोदधि नाerre तनुवात इमे त्रयः । सर्वतो लोकमावेष्ट्य निस्यास्तिष्ठति वायवः ॥। २०६० ॥ gaerat टीका में भी लिखा है--- artefa जगत्प्राणः सर्वलोकस्य वेष्ठन । घनप्रभजनो नाम [ ६५७ द्वितीयस्तदनंतरम् ॥२०६१। तनुयात उपयस्य त्रैलोक्याधार शक्तिमान् । वाता एते स्थिति स्तेषां कथ्यमानानि शम्यतं ॥२०६२।। प्रश्न :- चतुरिंगकाय के देवों में महा ऋद्धियों धारण करने वाले इन्द्रादिक देव अपनी आयु पूरी कर किस-किस गति को प्राप्त होते हैं ? उत्तर :- सौधर्म इन्द्र सम्यग्दर्शन प्राप्त होने के प्रभाव से उसकी महादेवी इन्द्राणी, समस्त दक्षिण दिशा के इन्द्र चारों लोकपाल समस्त लौकान्तिक देव और सवार्थ सिद्धि के श्रहमिन्द्र अपनी श्रायु के क्षय होने पर वहां से चयकर महा पुण्याधिकारी मनुष्य भव धारण करते हैं। वहां पर वे पुरुष ही होते हैं। संसार के सुखों को भोगकर मुनिव्रत धारण कर तथा तपश्चरण कर केवलज्ञान पाकर मोक्ष जाते हैं। - अर्थात् ऊपर लिखे हुए सौधर्म इन्द्रादिक देव एक भवावतारी जीव हैं । एक मनुष्य भव धारण करके ही मोक्ष जाते हैं । दिशों के देव पांचों पंचोत्तरों के देव वहां से चयकर नारायण प्रतिनारायण पद को कभी नहीं पाते हैं । इस प्रकार तिर्यञ्च मनुष्य और भवनत्रिक के देव अपनी भायु के क्षय होने पर वहां से चयकर शलाका पुरुष कभी नहीं होते अर्थात् Patar तीर्थंकर बारह, चक्रवर्ती, नौ-नारायण, नौ बल भद्र और नौ प्रतिनारायण इन त्रेसठ शलाका पुरुषों की पदवी को कभी प्राप्त नहीं होते तथा विजयादिक विमानों में रहने वाले अहमिन्द्र तथा अनुदिशों के ग्रहमिन्द्र मनुष्य भव धारण कर मोक्ष जाते *
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy