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________________ ६५६ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिण जीवों को मिथ्यात्वादिक महापापों का त्याग कर देना चाहिये । सम्यग्दर्शन धारण करना चाहिये तथा अपने आत्मा का कल्याण करने के लिये अहिंसा आदि श्रतों को धारण करना चाहिये। प्रश्न :--यहां पर नरकों में जाने को जो संख्या लिखी है, सो जीव नरकों से निकलकर अन्य जन्मों को धारण करते हैं, फिर नरकामें जाता है। सो नरक से निकलकर किन-किन. गत्तियों में जन्म लेसा है ? उसर :--नरक गति से निकलकर मनुष्य और तिर्यञ्च गति ही प्राप्त होती है । मनुष्य का तिर्यञ्च गति को पाकर बाकी बचे हुए पहले के पाप कर्म के उदय से वा उस उस भव में किये हुये पाप कर्मों के उदय से. फिर नरक में जाता है । सातवें नरक से निकलकर तिर्यञ्च ही होता है । सो सिद्धान्तसार में लिखा है-- उत्कृष्टेन स्वसंतत्या सोऽसंजी प्रथमावनी । अष्टधारान् क्रमाद् गच्छेत्सरोसपोतिपापतः ॥२०५४।। सप्तवारान् द्वितीयायां तृतीयाया वयो अजेस् । पवारांश्च चतुष्पा हि पचवारान् भुजंगमः ॥२०५५।। पंचम्यां च चतुर्वारान याति सिंहो निरंतरम् । षष्ठयां यापिदिगवारान् सप्तम्यां वारद्वयं पुमान् ॥२०५६।। एवभ्रेभ्यो निर्गता एते तिर्यग्नरगतिहये । कर्मभूमिषु जायते गर्भजाः संजिनः स्फुटम् ।।२०५७।। प्रश्न :----स्वर्ग के विमान प्रकाश में किसके प्राधार से स्थित हैं ? उत्तर :--सौ धर्म स्वर्ग से लेकर सहस्त्रार तक बारह स्वर्गों के विमान जल और पवन के आधार से हैं । तथा प्रानत स्वर्ग से लेकर बाकी के स्वर्ग, नौ ग्रेवेयक, नौ अनुदिश और पांचों पंचोत्तरों के समस्त विमान बिना किसी आधार के निराधार अपने आप स्थिर हैं । सो ही सिद्धांतसार दीपक के प्रथम अध्याय में लिखा है-- जलवातद्वया धोरणय योनि मनोहराः । प्रगान्ताधिकल्पाना चतुर्वा विमानकः ॥२०५८।। ग्रे वेयकादि पंचानुसरान्तानां भवन्ति ते। . निराधारास्त्रयोविशागू सहस्त्रप्रमाः स्वयम् ॥२०५६॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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